Tuesday, May 19, 2015

कविता: 16 मई के बाद...क्योंकि कविता अकेले नहीं चल सकती

 Posted by Reyaz-ul-haque

अंजनी कुमार की यह टिप्पणी कविता: 16 मई के बाद अभियान के सफर में एक ऐसे पड़ाव पर आई है, जब यह अभियान अपने पिछले साल की गतिविधियों के लेखे जोखे पर बात करते हुए अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ने की तैयारी कर रहा है. शायद इस टिप्पणी का इससे माकूल मौका और नहीं हो सकता था, जब पिछली उपलब्धियों के साथ, आने वाले वक्त की चुनौतियों और मौजूदा समझदारी के उन नुक्तों पर बात की जाए, जो इस अभियान के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं. 




कविताः 16 मई के बाद के अभियान को अभी साल भर होना बाकी है। लेकिन जिस कारण से यह कविता यात्रा शुरू हुई उसे एक साल हो गया है। हम इसकी तकनीकि पेचीदगी में जाएं तो कई सारे सवाल अनसुलझे, बहस के लिए हमेशा ही बने रहेंगे। इन अनसुलझे सवालों के बीच कई सारे सवाल हैं जिसकी धुरी संसदीय रास्तों से बनती हुई हमारे सामने चुनौती बनकर खड़ी है। इसका जवाब जितना आसान है उतना ही कठिन, शायद कोई बचकर निकलना चाहे तो उसके लिए एकदम से फालतू। लेकिन जब ‘लव जिहाद’ और ‘घर वापसी’ राजनीतिक दांवपेंच से अधिक बड़े खेल का नजारा दिखाने लगा और मोदी बाजार का निर्मित ब्रांड बनकर एक राजनैतिक फैशन बन गया तब निश्चय ही हालात उतने सामान्य नहीं थे जितने के आधार पर हम देश की राजनीति पर चाय की चुस्कियों में बहस को अंजाम तक पहुंचा देते हैं।




मुझसे भी कई सारे मित्रों ने पूछा है कि यह कविताः 16 मई के बाद क्या है? क्या मोदी इतना निर्णायक है? क्या राज्य का चरित्र इसी व्यक्ति में समाहित हो गया है? क्या यह हालात का सरलीकरण नहीं है? क्या यह व्यवस्था को समझने की हद दर्जे की नासमझी नहीं है? आदि आदि। इन सवालों का हमने अपनी ओर से हमेशा ही इतना ही कहा कि ‘यह भयावह दौर के खिलाफ एक छोटा सा प्रयास है’। अपने देश में जनसंहार करते हुए सत्ता हासिल करने का अनुभव बहुत पुराना है। लोकतंत्र और देश के नाम पर संसद में बहुमत हासिल करने का सिलसिला 1947 से चला आ रहा है। कांग्रेस से शुरू होकर यह रणनीति भाजपा तक खत्म नहीं होती। ये रणनीतियां चुनाव तक ही सीमित नहीं हैं। बल्कि एक उलट प्रक्रिया है। यह अर्थव्यवस्था और समाज के भीतर से बनते हुए चुनाव की रणनीति में बदलती है। कारपोरेट समूह और साम्राज्यवादी पूंजी के लिए जिस गुजरात मॉडल को बनाया गया- इसी मॉडल को बनाने के लिए बंगाल की बुद्धदेव सरकार काफी बेचैन थी और जनआंदोलनों की वजह से वह असफल रहा, उसे जब देश के स्तर पर लागू करने की सहमति बनने लगी तब हालात पहले इतने सामान्य नहीं रहे। इस प्रयोग में आरएसएस, भाजपा और इससे जुड़े हजारों देशी-विदेशी संगठन, बुद्धिजीवी, मीडियाकर्मी शामिल थे। कांग्रेस ने जिस जमीन को तैयार कर दिया था उस पर ब्रेख्त के गैंगस्टर नाटक के मंचन का स्टेज तैयार हो चुका था। मोदी इस पूरी राजनीति का निमित्त मात्र नहीं है और भाजपा अर्थव्यवस्था के मालिकों की मजबूरी नहीं है। यह औद्योगिक और वित्तीय पूंजी का लंबे समय से चले आ रहे मंदी से उबरने का एक बेसब्र प्रयास है जिसमें भाजपा, कांग्रेस से लेकर एसोचेम, फिक्की आदि की सहमति थी। यह सहमति गैंगस्टर के मंचन को पेश कर रहा था। यह सहमति गुजरात मॉडल के सारे अपराधों को धार्मिक कर्म की तरह स्वीकार्यता में बदल रहा था। यह सहमति मोदी को नेतृत्व में बदल देने की थी। मोदी का गुजरात से अयोध्या और फिर बनारस तक की यात्रा का निहितार्थ सिर्फ दिल्ली फतह नहीं था। यह रैंप पर चलता मॉडल था और इसकी व्यवस्था फासीवादी संगठन कर रहा था और अर्थव्यवस्था इसके साथ चलने के लिए तैयार बैठी हुई थी। जब पूरी दुनिया का कारोबार का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा वित्तिय कारोबार में डूबा हुआ हो और अपने देश में काला बाजार सामानान्तर अर्थव्यवस्था में बदल गया हो ऐसे में फासीवादी खतरे को समझना उतना कठिन नहीं है जितना वोट के आंकड़ों में लोकतंत्र के बचे रहने के सिद्धांत में बना दिया जाता है।




इस राजनीति और अर्थव्यवस्था में कविताः 16 मई के बाद कहां से आ गई? तब यह भी सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि कविता और साहित्य समारोहों में मोदी और आरएसएस कहां से आ गए? कान्हा रिसार्ट, रायपुर, नागपुर, बनारस, दिल्ली से लेकर जयपुर और कलकत्ता तक साहित्य में मोदी और आरएसएस की चर्चा कहां से आ गई? साहित्य समारोहों में भागीदारी बहस और अनसुलझे सवाल की तरह आकर खड़ा हो गया। कविता में यह घुसपैठ किस रास्ते से हुई है। साहित्य में बड़े पैमाने पर जिन नौदौलतियों की आमद हुई है क्या हम उस ओर देख पा रहे हैं! पैसे के जोर और अंग्रेजी की बदौलत हिन्दी साहित्य में पैर रखने वाले नौकरशाहों, व्यवसायियों, अन्यत्रवासी सामंतों और एनजीओकर्मियों की जो बढ़त हुई है उनके पैरों की जमीन वैश्वीकरण के तल पर जाकर लगती है। जिस तरह मोदी की चाह सुसांस्कृतिक रूप में दिखने की है, वैसी ही चाह इनकी भी है। यह समूह अपने कुकर्मों को साहित्य और संस्कृति की शब्दावली से खूबसूरत बना देना चाहता है और इसके लिए वह कविता को कहीं भी बैठा देने के लिए उतावला है। और, इसका असर हिन्दी साहित्य जगत में खूब दिख रहा है। चेतन भगत बनने की इच्छा हो या साहित्य को राजनीतिक कर्म से उबार लेने का प्रयास हो, सभी जगह साहित्य को कमाऊ और आकर्षक बना देने की बेचैनी है। यहां हमें इस बात को जरूर याद रखना चाहिए कि यह स्थिति रातों रात नहीं बनी है। यदि हम केवल हिंदी क्षेत्र की बात करें तो 1947 के बाद लगभग तीन दशक तक कोई भी वामपंथी साहित्य संगठन सक्रिय नहीं दिखता। नक्सलबाड़ी के बाद ही खासतौर से विप्लव रचयितालु संघम की स्थापना के बाद एक अखिल स्तर पर प्रयास और साहित्य संगठनों को पुनर्जीवन मिलता है। यह प्रयास और पुनर्जीवन भी इतना टूटा बिखरा हुआ था कि वह आम जीवन को संबोधित भी नहीं कर सका। साहित्यकारों को घेटो कलकत्ता और दिल्ली में बनता गया और इलाहाबाद और पटना जैसे शहर उजाड़ में बदलते गये। इस उजाड़ और बसाव में साहित्य प्रवक्ताओं, चुटकलेबाजों, जीहुजूरों का मेला लग गया और विश्वविद्यालय, कॉलेजों में नौकरीशुदा साहित्यकारों की बाढ़ आ गई। दूसरी ओर वैश्वीकरण की नई खेप दिल्ली के केंद्र में कविता को खोजने में लगी हुई थी और जब यह मिलने लगी तब साहित्य का केंद्र भी खिसकने लगा।




कविताः 16 मई के बाद इसी रूप में साहित्य की राजनीति है। पिछले पच्चीस सालों में किसानों की मौत गिनी जाए, जनसंहारों में दलित, आदिवासी और मुसलमानों की मौत को गिना जाए, घर और सड़क पर महिलाओं और बच्चियों की मौत को गिना जाए, फौज और पुलिस के हाथों कार्यकर्ताओं, क्रांतिकारियों, गुरिल्लों और लड़ाकूओं की हत्या को गिना जाए और उससे अधिक सत्ता के स्ट्रक्चरल वायलेंस यानी सत्ता के होने की वजह हुई मौतों को गिना जाए जिसमें बिमारी और भूख, आत्महत्या और पागलपन शामिल है, तब कविता आह के रूप में भी नहीं निकलेगी। यह मानचित्र को चबा जाने की आदिम भूख के रूप निकलेगी।




कविताः 16 मई के बाद की अवधारणा से कोई सहमत हो सकता है और नहीं भी। लेकिन जिस हालात में यह अवधारणा बनी है वह इसके आयोजकों के दिमाग में आसमान से अचानक ही नहीं टपक पड़ा है। यदि वे ऐसा सोचते हैं तब इस अभियान का हस्र संकीर्णता का एक और गढ्ढा बना देने तक सीमित हो जाएगा। हम कह सकते हैं कि पिछले दस सालों में साहित्य और संस्कृति पर जिस तरह का प्रयास चला है, यह अभियान भी उसी की कड़ी है। प्रतिरोध का सिनेमा ऐसा ही प्रयास है। अशोक भौमिक ने कला और अपने लेखन से जैनुल आबदीन, चित्त प्रसाद, कमरुल हसन से लेकर रविन्द्रनाथ टैगोर की पेंटिंग और अपने लेखन से समकालीन कला, रंगमंच, भाषा आदि को जिन प्रयासों से आम लोगों के बीच ले गये हैं उससे जनसंस्कृति की धारा मजबूत हुई है। नक्सलबाड़ी के दौर में उभरे हिंदी कवियों में बहुत से लोग रास्ते की तलाश में अब भी भटक रहे हैं लेकिन नीलाभ की राजनीति में खुली पक्षधरता और उनकी कविता, रंजीत वर्मा का साहित्य लेखन और उनका नवीनतम संग्रह लकीर कहीं एक खींचनी होगी आपको उस धारा को आगे ले जाते दिखते हैं। इस बीच मंगलेश डबराल का काव्य संग्रह नये युग में शत्रु ने अपने समय की चुनौतियों को रेखांकित करने का काम किया है और साहित्य की राजनीति के संकट नए सिरे संबोधित करने का आह्वान किया है। इस दौरान युवा कवियों ने खुलकर कविता को अपने समय को सीधी भाषा में संबोधित करने का साहस किया है। मंच से कविता पढ़ना जिसे हेय दृष्टि से देखा जाने लगा था, अब एक बार फिर अपनी ऊंची आवाज के साथ वापस आया है। कविताः 16 मई के बाद के तहत कविता पाठ चाहे जेएनयू में हुआ हो या पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के खचाखच भरे हाल में, लोगों ने जिस तरह कविता को सुना है उससे दिल के भीतर की बेचैनियों को पढ़ा जा सकता है। यहां चंद कवियों का नाम देना न तो तरफदारी है और न ही किसी के प्रति उदासीनता। अच्छी बात है कि नक्सलबाड़ी धारा का प्रभाव खत्म नहीं हुआ है, अब भी वरवर राव को सुनने के लिए लोग आते हैं। अब भी जनवादी धारा के भीतर उठी बहसें संतुलन में नहीं हैं और बेचैनी बनी हुई है। प्रगतिशील धारा को जनता तक पहुंचने की तड़प है। 




जनसंस्कृति का झंडा उठाये लोग अब क्रांति की बात कर रहे हैं। यह सब इसलिए है कि हम सब जनता के प्रति जिम्मेदारी महसूस करते हैं, हम अपनी जिंदगी को जहालत में झोंक देने के लिए तैयार नहीं हैं और हमारे लिए गैंगस्टर राज बर्दाश्त नहीं है।




यह सब कविता :16 मई के बाद के एक साल से भी कम के सफर के दौरान हुआ है. लेकिन चूंकिकविताः 16 मई के बाद को आगे अभी लंबा सफर तय करना है, इसलिए इस मौके पर उपलब्धियों के साथ साथ इस पहलकदमी को अपने उद्देश्य के बारे में और धारदार तथा और भी स्पष्ट समझदारी और सांस्कृतिक उपकरणों से लैस होना है. ठीक ऐसे मौके पर कुछ बातें ऐसी भी हैं, जो इस पहलकदमी के सामने मौजूद चुनौतियों को देखते हुए उचित नहीं जान पड़तीं. जैसे कि कविता: 16 मई के बाद का आधार वक्तव्य, जिसे रंजीत वर्मा ने जारी किया है। इस आधार वक्तव्य में बहुत सारी गड़बड़ियां हैं। फासीवादी अंध-राष्ट्रवाद को पहचान यानी आइडेंटिटी की राजनीति से जोड़ देना और यह दावा करना कि 'न कोई आंदोलन आगे है या पीछे और ऐसे में कविता अकेले निकल पड़ी है' फासीवादी राजनीति और जनआंदोलनों के बारे में नासमझी को ही दिखाता है। कविताः 16 मई के बाद को जिन चुनौतियों के साथ काम करना है उसमें ऐसी उथली समझदारी बाधा बन जाएगी। मैं इस कविता अभियान में एक हिस्सेदार के बतौर ही यह बात रख रहा हूं और उम्मीद करता हूं कि इस अभियान में शामिल होते लोगों को एकजुट किया जाय, एक दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए मंच का गठन किया जाय और न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर कविताः 16 मई के बादको उन तक ले जाया जाए जो बेचैनी से उसी कविता को सुनना चाहते हैं जो उनके भीतर आह बनकर अंदर ही अंदर टूट रहा है, बिखर रहा है...।