Friday, August 5, 2016

हम तो कलम के सिपाही हैं - वरवर राव (भाग-2

वरवर राव के साथ बातचीत (भाग-2)


नाटककार रामू रामानाथन द्वारा लिए जा रहे ‘विरसम’ के संस्थापक सदस्य वरवर राव के साक्षात्कार की दूसरी कड़ी में इस माओवादी विचारक और तेलुगु कवि ने अपने क्रांतिकारी जीवन के बारे में महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के जन-आन्दोलनों के बारे में क्रांतिकारी साहित्य के सृजन और प्रकाशन के बारे में और आन्दोलन ने किस तरह कुछ महान रचनाकारों को पैदा किया, इस पर बात की।
कवि बतौर क्रांतिकारी


रामू रमानाथनः इन सबके बीच में कवि वरवर राव के साथ क्या हो रहा है?
वरवर राव: मैं कविता और सामाजिक टिप्पणियों के साथ-साथ पत्रिकाओं में साहित्यिक समीक्षा भी लिख रहा हूँ। अच्छी बात है कि मुख्यधारा के तेलुगु दैनिक भी क्रांतिकारी लेखन प्रकाशित करते हैं।
रामू रामानाथन: 1985 से 1992 तक आपने कई बाधाओं और चुनौतियों का सामना किया।
वरवर राव: वस्तुतः तेलंगाना संघर्ष के लिए हमलोग 1969 से ही लगे हैं। यदि आपको याद हो, कोण्डापल्ली सीतारमैय्या ने इस आन्दोलन को शुरू किया जो कि वारंगल में उनके खुद के अनुभव पर आधारित था। असमान विकास और तेलंगाना की सरासर उपेक्षा को वे अपनी आँखों से देख रहे थे। जैसा कि आप जानते हैं, उस दौरान तेलंगाना हैदराबाद की निजामशाही का हिस्सा था। वे दिन निजाम के खिलाफ़ तेलंगाना के गौरवपूर्ण सशस्त्र-संघर्ष के दिन थे और निजाम को ब्रिटिश उपनिवेशिवादियों का समर्थन भी प्राप्त था। 1948 की सैन्य कार्यवाही के बाद हैदराबाद प्रांत को भारतीय संघ में जोड़ा गया। 1950 में प्रथम आम चुनावों के पश्चात् बहुमत प्राप्त कर सरकार स्थापित हुई। इसके साथ ही, तेलंगाना में मुल्की आन्दोलन प्रारम्भ हुआ। 1956 में राज्य (प्रांत) के निर्माण के पश्चात् तेलंगाना के लिए ‘तेलंगाना क्षेत्रीय समिति’ के पर्यवेक्षण के अन्तर्गत कुछ निश्चित विशेष प्रावधान किए गए। परन्तु इन सभी का उल्ल्ंघन किया गया। अतः 1968-69 में छात्रों के द्वारा संचालित एक लड़ाकू पृथक सैन्य तेलंगान आन्दोलन उभरकर सामने आया। उसी दौरान श्रीकाकुलम का संघर्ष भी चल रहा था। सरकार ने इन दोनों आन्दोलनों के विरुद्ध दमनकारी नीतियाँ अपनायी। दोनों आन्दोलनों में पुलिस फायरिंग के दौरान 370 छात्र और नौजवान मारे गए। यदि आप पीछे देखें तो यह बिल्कुल स्वाभाविक थाा कि वे छात्र जो कि कोंडापल्ली सीतारम्मैय्या नेतृत्व में पृथक-तेलंगाना-आन्दोलन के साथ जुड़े हुए थे वे क्रांतिकारी आन्दोलना के साथ जुड़ गए। उनमें से कुछ आज भी आन्दोलन में हैं और कई शहीद हो गए जैसेकि किशन जी और नल्ला अदिरेड्डी (उर्फ श्याम)।
रामू रमानाथनः आपने महाराष्ट्र की बात की और कैसे वहाँ के बुद्धिजीवी, कलाकार और मध्यवर्ग ने बिल्कुल चुप्पी साध ली। भयमेव जयते के इस दौर में क्या हमारे लिए कोई प्रेरणा है?
वरवर राव: महाराष्ट्र की अपनी सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आन्दोलनों की एक महान परंपरा रही है। नामदेव की तुलना कबीर और वेमना से की जा सकती है, जिन्होंने कई तरह के सामाजिक आन्दोलनों को उभारा। महात्मा ज्योतिबा फुले और डाॅ० भीमराव अम्बेडकर की पूरी दुनिया में एक विशिष्ट पहचान है। वे ऐसे दूरदर्शी हैं जिन्होंने शोषित एवं पीड़ित जन-समुदाय की सामाजिक एवं सांस्कृतिक मुक्ति के लिए कार्य किया है। महाराष्ट्र खासकर के बाम्बे शहर में मजदूर-वर्ग के आन्दोलनों का एक सशक्त इतिहास रहा है। लगभग सौ साल पहले, जब लोकमान्य तिलक को आजीवन कारावास दिया गया और उन्हें अण्डमान द्वीप भेज दिया गया, तो बाम्बे में एक विशाल मजदूर (श्रमिक) आन्दोलन चला। यह हमारे देश में श्रमिक-वर्ग के आन्दोलन की शुरुआत थी।
रामू रमानाथनः आपने शहरी मजदूरों के बारे में एक कविता लिखी है।
वरवर राव: हाँ, 1964-65 के दौरान मैंने एक कविता लिखी थी जब बाम्बे बन्दरगाह के मजदूरों ने उस गेहूँ को ढोने से इनकार कर दिया जो अमेरिका द्वारा पीएलएक 480 के अन्तर्गत भेजा गया। नक्सलबाड़ी आन्दोलन का प्रभाव श्रमिक-वर्ग के लड़ाकू आन्दोलन पर देखा जा सकता है। विशिष्ट रूप से 1980 के दशक के आन्दोलन पर। यद्यपि यह आन्दोलन दत्ता सामन्त के नेतृत्व में चलाया जा रहा था। पर दरअसल इसे नौजवान भारत सभा ने लीड किया। बाम्बे मिल मजदूरों की एक दिन की हड़ताल पूरे देश में लड़ाकू संघर्ष के लिए मिसाल बन गयी। जैसा कि गुरवीर सिंह ने ‘इकाॅनामिक एण्ड पोलिटिकल वीक्ली’ के एक लेख में यह स्वीकर किया है कि यह आन्दोलन सिंगरिनी कार्मिक सामाख्या संगठन और तेलंगाना के गोदावरी घाटी में चल रहे आन्दोलन से प्रेरित था।
रामू रामानाथनः आपने कहा है ‘‘हमलोग कवि और युवा आन्दोलन दोनो रूप में 1970 के दशक के दलित पैंथर्स के द्वारा प्रेरित थे। वह कैसे?
वरवर राव: इससे पूर्व हमलोग आंध्रप्रदेश के ‘दिगम्बर कावुलु’ से प्रभावित थे। 1965-68 के दौरान यह मौजूद था। जबकि ‘दलित पैंथर’ 1972 में माक्र्स और अम्बेडकर से प्रेरणा प्राप्त करके उभरा। उन्होंने युवा साहित्यकारों और सामाजिक आन्दोलनों के इतिहास में एक नया अध्याय खोला। आरम्भ में हमने सुना कि महाराष्ट्र में एक स्टडी सर्किल स्थापित की गयी है। हमने इस स्टडी सर्किल से प्राप्त एक पुस्तिका का अनुवाद किया जिसमें यह बताया गया था कि इस दुनिया को समझने के लिए माक्र्सवाद और लेनिनवाद सूक्ष्मदर्शी (डपबतवेबवचम) एवं वृहतदर्शी (डमहंेबवचम) है। दिवंगत पी०ए० सेवेस्टियन जैसे लोगों ने (सी०पी०डी०आर०-लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षा समिति के एक संस्थापक सदस्य और इस समिति के आजीवन कार्यकत्र्ता) इस देश में लोकतांत्रिक आन्दोलनों के लिए महत्वपूर्ण येागदान दिया था। मैं उन्हें एक महान लोंकतांत्रिक दूरदर्शी मानता हूँ, जैसे कि रजनी कोठारी, के०जी० कन्नबीरन (भारत के मानवाधिकार आन्दोलन की महान शख्सियत), माधव साठे जैसे लोग भी थे जिन्होंने सी०पी०डी०आर० में काम किया था। ये सभी लोग आंध्रप्रदेश आये और इन्होंने फैक्ट फाइंडिंग टीमें बनायी।
रामू रामानाथनः आंध्र-प्रदेश का महाराष्ट्र के साथ जुड़ाव कैसे आरंभ हुआ?
वरवर राव: महाराष्ट्र के साथ हमारा जुड़ाव कामरेड पेड्डीशंकर के गोदावरी पार करके गढ़चिरौली पहुँचने के साथ शुरू हुआ। गढ़चिरौली जिला तब नहीं बना था। यह सिरोंचा के नाम से जाना जाता था। गढ़चिरौली, सिरोंचा जिले का एक हिस्सा था। सी०ओ०सी०, सी०पी०आई० (एम०एल०) (जनयुद्ध) संगठन बनाने का प्रयास कर रही थी। गोदावरी नदी पार करने, गढ़चिरौली और बस्तर के जंगलों में प्रवेश करने का निश्चय किया गया। पेड्डीशंकर के नेतृत्व में एक टीम गढ़चिरौली भेजी गयी और बस्तर में सात टीमें भेजी गयी। साथी पेड्डीशंकर पकड़े गए और एक फर्जी मुठभेड़ में मारे गए। सी०पी०डी०आर० ने इस फर्जी मुठभेड़ की जाँच करवाई जसमें मेरे अलाव शोमा सेन, कोबड़ घंड़ी, आलम रजैय्या और अन्य साथी सम्मिलित थे। महाराष्ट्र में यह पहला अवसर था। नक्सलबाड़ी आन्दोलन के पश्चात महाराष्ट्र में सम्भवतः यह पहली मुठभेड़ थी। हालाँकि पेड्डीशंकर मारे गए और गढ़चिरौली में हमारे लिए यह शुरुआती झटका साबित हुआ लेकिन वहाँ आन्दोलन जिसका आगाज पेड्डीशंकर के साथ हुआ वह आज भी गढ़चिरौली में इस अर्थ में जारी है कि गढ़चिरौली दण्डाकारण्य का ही एक बन चुका है।
रामू रामानाथनः आपने मुम्बई प्रेस क्लब में अरुण फरेरा की पुस्तक के लोकार्पण के दौरान अपने भाषण में कहा था कि गढ़चिरौली का आन्दोलन सर्वाधिक शक्तिशाली आन्दोलनों में से एक था। आपने यह भी कहा था कि बस्तर क्षेत्र में चल रहे दमन से कहीं ज्यादा दमन गढ़चिरौली में हो रहा था और इस परिस्थिति में बुद्धिजीवी-वर्ग की चिन्ताजनक चुप्पी......
वरवर राव: मैंने इस बारे में अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में भी बोला था और वर्धा तो गढ़चिरौली के जंगलों के काफी करीब है। अतः मैं यह बात बुद्धिजीवी प्रोफेसरों से कह रहा था कि ठीक आपके बगल मे जंगल है जहाँ साम्राज्यवादी हमले और लूट और सामंती ताकतों के खिलाफ आदिवासी लोग लड़ रहें हैं। मुम्बई के बुद्धिजीवी तो इन क्षेत्रों से बहुत दूर बैठे हैं। इसलिए मैं उन्हें जो कुछ भी गढ़चिरौली में हो रहा था उससे परिचित कराना चाहता था। किस तरह का और किस हद तक राज्य ने उनके ऊपर दमन का मोर्चा खोल दिया था। इस प्रसंग में मैं महाराष्ट्र में बुद्धिजीवियों की भूमिका की ओर इशारा कर रहा था। यदि आप स्पेनिश गृह-युद्ध की ओर देखें या फिर नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम संघर्ष के दौरान देखें तो बुद्धिजीवियों, लेखको और कवियों ने आन्दोलन के धार को और पैना किया था। लेकिन आज भूमण्डलीकरण और बाजार के प्रभाव में फँसकर बुद्धिजीवी लोग जनान्दोलनों से स्वयं को पृथक कर ले रहे हैं।
रामू रामानाथनः क्या यह कहना ठीक होगा कि यह परिघटना पूरे विश्व में विद्यमान है और इस देश में 1992 से प्रारम्भ होकर, अधिकांशतः 2001 के बाद से इसका ज्यादा असर हुआ है? ऐसा लगता है कि मध्यवर्ग जन-विरोधी हो गया है......
वरवर राव: मैं यह नहीं कर रहा हूँ कि मध्यवर्ग जन-विरोधी हो गया हैं। मैं यह कह रहा हूँ कि मध्यवर्ग जनान्दोलनों के प्रति तटस्थ हो गया है। अपने स्वार्थों के लिए वे खुद को जनान्दोलनों से दूर कर रहे हैं। वे जनान्दोलन को समझने की कोशिश ही नही कर रहे हैं। लैटिन अमेरिका के एक कवि ने कहा था कि एक ऐसा दिन आएगा जब तुम्हारा दूधवाल और पेपर (समाचार-पत्र) बेचने वाला आएगा और इसी मध्यवर्ग से पूछेगा कि उस समय तुम क्या कर रहे थे जब हम लोग दमन का सामना कर रहे थे। तब तुम्हारी सहायता करने के लिए कोई नहीं होगा। तुम अकेले पड़ जाओगे। भारत में भी मध्यवर्ग के लिए ऐसा दिन आएगा।
क्रांतिकारी लेखन का आगाज़
रामू रामानाथनन : मैंने वरलक्ष्मी और उदयभानु के बारे में सुना है जो तेलुगु मे लिखते हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि इस तरह का साहित्य कितना प्रकाशित हो पाता है?
वरवर राव: पिछले तीन-चार साल में हमलोगों ने करीब 40 किताबें प्रकाशित की हैं और उनमें से अधिकांशत, कहानियों के संग्रह हैं इनमें से ज्यादातर कहानियाँ शाहिदा, मिडको, नीत्या और मैना (उलदं) जैसी लेखिकाओं ने लिखी है। नीत्या ने काफी अर्से पहले प्रेमचंद की रचनाओं की माओवादी दृष्टिकोण से आलोचना भी लिखी है। मैंने बासागुड़ा के बारे में ‘बीजभूमि’ शीर्षक से एक कविता लिखी है। पाणि, उदयभानु और केनारी जैसे कवियों ने आॅपरेशन ग्रीन हंट, जनताना सरकार और दण्डकारण्य आन्दोलन के ऊपर अनेक कविताएँ लिखी हैं। आज, हमलोग दण्डकारण्य की कहानियों की शंृखला को नियमित रूप से प्रकाशित कर रहे हैं।
रामू रामानाथनः आपने इन किताबों को कैसे प्रकाशित किया?
वरवर राव: हमलोगों ने उन रचनाओं की कम से कम 1000 प्रतियाँ प्रिन्ट करायी और उसके बाद पुस्तक विक्रेताओं के पास उन्हें भेज दिया। हमारे पास खुद का अपना प्रकाशन प्रकोष्ठ है। हमारे सभी सम्मेलनों के दौरान हमलोग पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाते हैं। 24 अगस्त 2014 को लगभग 80 लेखक और बुद्धिजीवी एक सम्मेलन के लिए एकजुट हुए थे। इनमें से कुछ लेखकों ने तेलुगु दैनिकों में हमारे दृष्टिकोण को स्वर देने वाले लेख लिखकर अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। हमारे लिए यह केवल संवृद्धि (फलने-फूलने) का मसला नहीं है बल्कि यह पूरी मूल्य-व्यवस्था और संस्कृति के विकास कीकथा है।
रामू रामानाथनः क्या वहाँ के साहित्यिक-आन्दोलन में तीव्रता आयी है? क्या हमलोग रामन रेड्डी के कद के लेखकों को पैदा करने के योग्य हो गए हैं?
वरवर राव: हाँ निश्चित रूप से। प्रत्येक दशक, समय की माँग के अनुरूप अपने तरह के नेतृत्वकारी लेखकों को पैदा करता रहा है। और वे उतना ही अच्छा काम कर रहे हैं जितना कि के०वी०आर० (कोडावतिगन्थी कुटुम्बाराव) ने किया था। बस केवल भाषा की समस्या की वजह से राज्य के बाहर उनके योगदान के बारे में चर्चा नहीं हो पा रही है। उदाहरणके लिए, टी० मधुसूदन राव का माक्र्सवादी साहित्यिक समीक्षा के क्षेत्र में जो योगदान है उसने न केवल क्रांतिकारी साहित्यिक समीक्षा की धार को पैना किया है बल्कि उसने साहित्यिक के समीक्षा को काफी ऊँचे ओहदे पर भी पहुँचा दिया। तेलुगु साहित्यिक संसार इसे स्वीकार करता है। यद्यपि उनका सारा काम अंग्रेजी भाषा के माक्र्सवादी शिक्षकों पर आधारित था इसके बावजूद उन्होंने अंग्रेजी में कुछ भी नहीं लिखा। इसीलिए वह तेलुगु राज्य के बाहर नहीं जाने जाते हैं। सी०वी० सुब्बाराव, बालगोपाल, वणुगोपाल और डाॅ० के श्रीनिवास ने माक्र्सवादी साहित्यिक समीक्षा की परंपरा को जारी रखते हुए उसका दायरा व्यवहारिक समीक्षा तक बढ़ा दिया। स्वर्गीय चेनचैय्याह ने तेलुगु भाषा के बारे में एक बेहतरीन किताब लिखी है। आलम रजैय्याह, बी०एल० रमुलु, राधेश्याम द्वारा लिखी गयी लघु कहानियाँ हिन्दी में भी अनुवादित की गयीं। वी० चेन्चैय्याह जो कि आपातकाल के पश्चात त्ॅ। (विरसम) से जुड़े, वे ज्ञटत् से भी अधिक लम्बे समय तक लगभग 1990-94 तक, हमारे संगठन के सचिव रहे।
रामू रामानाथनः पाणि के बारे में आप क्या कहते हैं? उन्हें काफी तारीफ मिली है।
वरवर राव: पाणि विभिन्न विधाओं के लेखक हैं। नब्बे के दशक से लेकर अब तक उन्होंने तीन उपन्यास, एक लम्बी कविता, दण्डकारण्य आन्दोलन के ऊपर एक काव्य-संग्रह के साथ-साथ एक साहित्यिक समीक्षा प्रकाशित की है। वे कहानीकार भी हैं। चूँकि ये दो लोग हिन्दी या अंग्रेजी में बातचीत या भाषण नहीं देते इसलिए उन्हें इस राज्य के बाहर जानने वाला कोई नहीं है। चलसानी प्रसाद और सी०एस०आर० प्रसाद जोकि अंग्रेजी में बोल सकते थे आज वे राज्य के बाहर भी जाने जाते हैं। जबसे कल्याण राव का उपन्यास अंग्रेजी और कई अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवादित हुआ तबसे उन्हें पूरे भारत में जाना जाने लगा। ठीक इसी तरह, बालगोपाल और वेणुगोपाल भी त्ॅ। (विरसम) से निकले हैं, जिनकी प्रसिद्धि उनकी अंग्रेजी रचनाओं की वजह से है। हमारी वर्तमान सचिव, वरलक्ष्मी 28 साल की हैं। वह भी विभिन्न विधाओं की रचनाकार हैं। वह कविता, कहानियाँ और साहित्यिक समीक्षाएँ लिखती हैं। दुनिया के बारे में उनकी समझ बहुत अच्छी है। इसलिए उन्होंने पर्यावरणीय मुद्दों के बारे में अध्ययन किया और उसमें विशिष्टता हासिल की और इसी विषय को वह एक काॅलेज में पढ़ाती भी हैं। इसी रुचि के कारण वह कुडमकुलम गयी और अखिल भारतीय तथ्यान्वेषण समिति की एक महत्त्वपूर्ण सदस्य रहीं और पूरे देश के अन्य कार्यकर्ताओं के साथ उनको भी एक मामले में फँसाया गया था। उन्होंने कुडमकुलम के परमाणु-संयंत्र के खतरे के ऊपर एक मुकम्मल पुस्तक प्रकाशित की। वह लोकप्रिय तेलुगु दैनिक पत्रों में लेख इत्यादि लिखती हैं। इसके साथ ही, आज के युग कों देखते हुए सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हैं। टीम के अधिकांश युवा सदस्यों की पहुँच सामाजिक मंचों द्वारा व्यापक पाठक वर्ग तक हो पाती है। किन्तु भाषा सबसे बड़ी बाधा है।
रामू रामानाथनः दूसरी लेखिकाओं के बारे में आपका क्या मानना है?
वरवर राव: रुक्मिणी, शशिकला और गीतांजलि जानी-मानी कहानीकार हैं। रुक्मिणी और गीतांजलि ने बेहतरीन उपन्यास लिखे है। कृष्णबाई और रत्नमाला न केवल त्।ॅ (विरसम) और साहित्यिक क्षेत्रों में जानी मानी है बल्कि तेलुगु जनता के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में भी उनका विशिष्टि स्थान है। शहीदा, मैना, नित्या, सुजाता और साधना जैसी भूमिगत कार्यकत्र्ताओं को, भले ही वे लोग ‘विरसम’ से सांगठनिक रूप से न जुड़ी हो, हम विरसम के आन्दोलन का अभिन्न अंग मानते हैं। आलम रजैय्याह और साधना की कहानियों और उपन्यासों, शाहिदा की कविताओं औा कहानियों और मिड़को, दमयंती, नीत्या, मैना, सुजाता की कहानियों और दूसरी रचनाओं के माध्याम से कोई भी बड़ी आसानी से जगीत्याल से लेकर दण्डकारण्य (1978 से आज तक) तक क्रांतिकारी आन्दोलन को पुनर्सृजित और पुनर्निमित कर सकता है।
रामू रामानाथनः और उदय भानु की विद्वत्तापूर्ण लेखनी के बारे में आपकी क्या राय है?
वरवर राव: हाँ, उदय भानु ने एक काव्य-संग्रह की रचना की पिलैनाग्रोवी वेन्नेना(त्पससंदंहमअप टमददमसं), वाद्देबोइना श्रीनिवास, रीवेरा (त्पअतं) और कासिम न केवल विरसम के बल्कि सम्पूर्ण तेलुगु साहित्य में आज के प्रख्यात कवि हैं। ये लेखक इस क्षेत्र में 25-30 वर्ष की अवस्था में आयें और वे सभी गैर-उच्चर्गीय पृष्ठभूमि से आते हैं।
रामू रामानाथनः आप ‘सृजन’ नामक साहित्यिक पत्रिका से भी जुड़े हैं। क्या यह अब नयी पीढ़ी के पाठकों के लिए उपलब्ध है?
वरवर राव: मैं 1966 से 1992 तक ‘सृजन’ से जुड़ा रहा था। ‘सृजन’ विरसम कीएक अनौपचारिक पत्रिका थी और अब ‘अरुणातारा’ संगठन का मुखपत्र है। हाँ, सृजन के सभी 200 अंक अब डी.वी.डी. (क्टक्) के रूप में उपलब्ध हैं। आपको यह जानकर खुशी होगी कि जब मुझे अक्टूबर 1973 में डप्ै। के अन्तर्गत कारावास में डाल दिया गया था तब मेरी पत्नी हेमलता ने मई 1992 के अन्त तक इसके संपादन, मुद्रण और प्रकाशन की जिम्मेदारी खुद सम्भाली। इस दरम्यान (1972-74), सृजन के छह अंकों को देशद्रोह के अन्तर्गत जब्त कर लिया गया मई 1974 की हड़ताल के दौरान ‘सृजना’ ने एक रेलवे मजदूर के द्वारा लिखी गयी एक कविता- ‘क्या जेल रेल को चला सकता है’ प्रकाशित की और उसी हेडिंग के अन्तर्गत एक सम्पादकीय भी लिखा। इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया। ठीक उसी समय आपातकाल का शिकंजा भी कसा जा रहा था। हेमलता को हिरासत में ले लिया और उन पर मुकदमा चलाया गया। इस मामले को लेकर वह उच्च न्यायालय पहुँची। उच्च न्यायालय ने ‘सृजन’ की जब्ती को बरकरार रखा। आपातकाल के पश्चात हेमलता के ऊपर देशद्रोह के अन्तर्गत मुकदमा चला और उन्हें दो साल की सजा दी गई। क्योंकि कोर्ट ने उनमें किसी भी तरह का पश्चताप नहीं देखा। यद्यपि उनके तीन छोटी-छोटी बच्चियाँ थी। इसके जवाब में मैंने एक कविता लिखी। ‘‘जिस दिन जेले ट्रेनों को चलाने लगेंगी उस दिन मैं मान लूँगा मैं व्यर्थ ही लिखता रहा।’’ तब तक रेलवे हड़ताल के सैनिक नेता, जार्ज फर्नांडिज़ केन्द्रीय सरकार में मंत्री बन गये और मंत्री बनने के बाद वे हैदराबाद आए। मीडिया ने उनसे इस विरोधभास के बारे में पूछा। उन्होंने ठीक ही कहा कि यह असंगतताओं का ‘ड्रामा’ है।
रामू रामानाथनः थियेटर आन्दोलन के बारे में कुछ कहना चाहेंगे?
वरवर राव: यहाँ, हमें थियेटर और इस अर्द्ध सामन्ती और अर्द्ध औपनिवेशिक व्यवस्था में इसके स्थान और भूमिका के बारे में बहस करनी पड़ सकती है। यदि आप थियेटर के इतिहास को देखें, विशेष रूप से हैदराबाद के शाही राज्य के शुरुआती दौर के इतिहास को तो यह कला पिछड़ी हुई आर्थिक-व्यवस्था के कारण विकसित नहीं हो पायी थी। जब तेलुगु की भूमि पर ब्रिटिश ताकातों ने कब्जा जगाया था। तब थियेटर महाराष्ट्र से आया। अतः कोई भी व्यक्ति तेलुगु राज्य में बंगला और मराठी जैसे थियेटर की कल्पना नहीं कर सकता है।
रामू रामानाथनः लेकिन तेलंगना के पास लोक-नाट्य की एक समृद्ध परम्परा मौजूद थी.....
वरवर राव: कम्युनिस्ट पार्टी ने सशस्त्र तेलंगाना संघर्ष (1947-51) के दौरान इसके स्वरूप को जन-नाट्य के रूप में रूपांतरित किया जब इसने अत्यन्त लोकप्रिय नाटक ‘मा भूमि अंधवीरा कुमकुमा’ खेला जिसे सुन्कारा सत्यनारायण और वेसीरेड्डी भास्करराव द्वारा रचा गया था और जिसे हजारों प्रस्तुतियों के बाद भी ब्रिटिश, निजाम और मद्रास के प्रान्तीय सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया था। (1972-80 के बीच जननाट्य मण्डली द्वारा) इसके स्वरूप को आगे राजनीतिक दृष्टि और नाट्यकला की दृष्टि से भी परिष्कृत किया गया। यह किसी मंचीय ड्रामा से अलग एक प्रकार का जन-थियेटर या लाल थियेटर है। यहाँ तक कि विरसम के द्वारा थियेटर के मंचीय मानकों के अनुरूप ड्रामा करने का प्रयास किया गया था। सत्तर के दशक में गंगीरेड्डी द्वारा लिखा गया ‘नान्दी’ (आरंभ) आंध्रप्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में प्रोसेनियम की तरह खेला गया। यद्यपि इस पर भारी दमनचक्र चलाया गया। इसके बाद, नागेटी छाल्लालो (जुते हुए खेत में) और बोग्गू पोरालो (कोयले की खान की परतो में) नाटक जो कि किसान-संघर्षों और कोयले खान के मजदूरों के संघर्षों पर आधारित थे, अस्सी के दशके में हैदराबाद, करीमनगर और गोदावरी की घाटियों में खेले गए। इन पर जबरदस्त प्रतिबंध लगाए गए।
रामू रामानाथनः कमतर समझ जाने वाले नाट्यरूपों-जैसे एकांकी-के बारे में क्या कहेंगे? लेफ्ट ने तो एकांकी विधा का बेहरतीन उपयोग किया है......
वरवर राव: चेराबण्डा राजू, रुद्रज्वाला, जी० कल्याणरावा और गिरि ने कई एकांकी नाटकों को लिखा है जिन्हें आन्ध्र-प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में खेला गया। चेराबण्डा राजू का ‘अल्पकालिक मजदूरी’ (ज्मउवतंतल स्ंइवनत), संविदा पर रखे गए अल्पकालिक मजूदरों के ऊपर और गांजीनील्लू, (लपसी का पानी) (ळतनमस ॅंजमत), भूमिहीन गरीबों के ऊपर लिखे गए एकांकी नाटक बहुत लोकप्रिय हुए त्ॅ। (विरसम) ने 1984 ई० में नुक्कड़ एवं गली-कूचों में खेले जाने वाले एकांकी नाटकों जैसे ओग्गु कथा, बुर्रा कथा जैसे एकांकी एवं सम्पूर्ण नाटकों के लेखन कौशलों में परिष्कार के साथ-साथ जनकलाओं के विभिन्न रूपों में भी परिष्कार के लिए एक दस दिवसीय कार्यशाला को आयोजित किया था। जब 2009 में केन्द्रीय सरकार ने राज्य सरकार के साथ मिलकर पूर्व एवं मध्य भारत में आॅपरेशन ग्रीन हंट के नाम से अपने लोगों के ही ऊपर शिकंजा कसने का निर्णय लिया तो त्ॅ। (विरसम) ने इसके खिलाफ साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अभियान चलाया था। दण्डकारण्य की जनता एक वैकल्पिक राजव्यवस्था और संस्कृति का निर्माण जनताना सरकार के नाम से कर रही है। त्ॅ। (विरसम) के वरिष्ठ लेखक उदय मित्रा ने इसी पृष्ठभूमि को आधार बनाकर दो नाटक लिखे। उसमें से एक ‘बासागुड़ा’ (2014) नामक नाटक कीप्रस्तुति वारंगल और हैदराबाद में की गयी। इसको बहुत पसंद किया गया। उसमें से दूसरा ‘जनता का चिकित्सक’ ( च्मवचसमष्े क्वबजवत) है जिसे 2015 में बोड्डिलह (आंध्र-प्रदेश) में प्रस्तुत किया गया।
रामू रामानाथनः ‘जनता का चिकित्सक’ ( च्मवचसमष्े क्वबजवत) का मंचन उसी वक्त तो हुआ था जब आप ‘विरसम’ (वारंगल) की 44 वीं कान्फ्रेंस करवा रहे थे?
वरवर राव: हमने ‘विरसम’ की 44 वीं कान्फ्रेंस के दौरान ‘बासागुड़ा’ का मंचन किया था सरकारी दमन के करण 1973 और 1979 में ‘साहित्यिक पाठशाला’ के सिवाय ‘वारंगल’ में कोई भी कांफ्रेंस कभी भी आयोजित नहीं की गयी, इस रूप् में ‘बासागुड़ा’ का मंचन एक बहुत बड़ी कामयाबी थी। हमलोग वहाँ इसलिए ऐसा कर पाए क्योंकि तेलंगाना आन्दोलन की वजह से हमें कुछ समर्थन मिल गया था। ओर कालोजी जैसे प्रसिद्ध जनकवि जिनकी जन्म शती इसी वर्ष है भी वारंगल के है। उन्होंने जबरदस्त सहयोग दिया आप सोचेंगे कि कालोजी जैसे गैर माक्र्सवादी त्ॅ। के लिए इतना महत्त्वपूर्ण कैसे हो सकते हैं। यद्यपि वह एक क्रांतिकारी लेखक नहीं थे। वह कबीर, नामदेव और विमना के जैसे जनकवि थे और जीवन भर यानी निजाम के दिनों से लेकर, चन्द्रबाबू नायडू के शासनकाल से लेकर मृत्युपर्यंत राज्य के खिलाफ बिना किसी समझौते के आजीवन लड़ते रहे। कालोजी नारायण राव हिन्दी, मराठी, तेलुगु और उर्दू जानते थे। 1940 के दौर में उन्होंने मराठी कहानियों का अनुवाद तेलुगु मे किया। कविताओं के साथ-साथ वे निबंध भी लिखते थे।

[यह साक्षत्कार जाने माने नाटककार और एक्टिविस्ट रामू रामानाथन द्वारा 2014 से 2015 के बीच तीन चरणों में लिख गया था। यह साक्षात्कार मम्बई में 26 सितम्बर 2014 को अरुण फरेरा की किताब ‘कलर्स आॅफ दि केज’ के विमोचन के अवसर पर वरवर राव के साथ बातचीत के सााि शुरू हुआ था। बाद में ईमेल के जरिए लम्बा संवाद हुआ जिसे अन्त में प्रश्नोत्तर के रूप में ढाला गया।