Tuesday, November 17, 2015

जल-जंगल-जमीन और आदिवासी आंदोलन


       शहीद बिरसा मुंडा की १४१ वीं जयंती पर bhu के छात्र संगठनो (bcm ,msm ,sfc ,sev ,aisf ,sc -st committi) द्वारा गोष्ठी आयोजित की गयी | इस गोष्ठी में बहुत से छात्रों - बुद्धिजीवियों ने भागीदारी की |गोष्ठी की अध्यक्षता हिंदी विभाग,बीएचयू के पूर्व विभागाध्यक्ष चौथीराम यादव ने किया | गोष्ठी की सुरुआत मशाल शांस्कृतिक मंच के साथी (अनूप युद्धेष,अनुपम) के गीत  "गाँवो छोड़ब नाही,जंगल छोड़ब नाही,माए माटी छोड़ब नाही,लड़ाई छोड़ब नाही" से हुआ | 


     गोष्ठी में डॉ. प्रमोद बागडे,डॉ.पंत,कविआत्मा,राजेंद्र चौधरी,बिनोद शंकर व अन्य वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किये | डॉ. प्रमोद बागडे ने अपना व्यक्तव्य देते हुए कहा कि इतिहास को हाशिये कि दृष्टि से देखने और व्याख्या करने कि जरुरत है | बिरसा मुंडा का आंदोलन साम्राज्यवाद ही नहीं बल्कि सामंतवाद के खिलाफ भी था | और उन्होंने बताया कि आदिवासी आंदोलन आज भी जारी है और सबसे खास बात है कि इस आंदोलन में महिला आंदोलम और संगठन सबसे बड़े रूप में है | लेकिन मिडिया द्वारा यह नहीं बताया जाता है | यह केवल जल-जंगल-जमीन का नहीं बल्कि संस्कृति का आंदोलन है | 

     बिनोद शंकर ने अपने व्यक्तव्य में कहा कि यह निजी और सामुदायिक स्वामित्व के बीच का संघर्ष है | वह की सारी संस्कृति और अर्थव्यवस्था सामूहिक थी जिसे साम्राज्यवाद-दलाल पूजीवाद-ब्राम्हणवादी सामंतवाद ने नष्ट करने का प्रयास किया |जिसके खिलाफ वहां सांस्कृतिक-राजनितिक आंदोलन खड़ा हुआ | यह कहना की आज माओवादी उनको बरगला रहे है यह बिलकुल ही बचकानापन है या साजिश है | वहां हमेसा से ही प्रतिरोध की संस्कृति रही है | आज जब लूट-दमन बढ़ा है तो संघर्ष भी बढ़ा है |और यह लूट इस कदर बढ़ गया है कि धरती के ३-४ सौ सालों में ख़त्म हो जाने कि संभावना है | इसलिए आज लड़ाई पूरी पृथ्वी और मानवता को बचाने की लड़ाई बन गयी है | अभी जो पर्यावरण को बचाने की बहस चल रही उसमे आदिवासी आंदोलनों व संघर्षो की बिलकुल चर्चा नहीं होती है जबकि वही वास्तव में जमीन पर पर्यावरण को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे है |  इसके अलावा बिनोद शंकर ने जल-जंगल-जमीन से जुडी अपनी कविताये भी सुनाये | 
    
   अंत में अध्यक्षीय भाषण देते हुए प्रो. चौथीराम यादव ने बुद्ध से लेकर कबीर,फुले,आंबेडकर के आंदोलनों की व्याख्या की और कहा कि बिरसा मुंडा का संघर्ष केवल आदिवासियों का विद्रोह नहीं है बल्कि इस तरह के सारे संघर्ष पुरे भारत के वास्तविक आंदोलन है | इस व्यक्तव्य में आंदोलन को व्यापक करने कि कड़ी प्रमुखता से जाति के सवाल को भी समेटा  | गोष्ठी का सञ्चालन सुनील ने किया | 

    अंत में जहाँ गोष्ठी हो रही थी ऐतिहासिक स्थान टंडन टी स्टॉल (टंडन जी पुराने समाजवादी नेता थे) से निकालकर सड़क पर बिरसा मुंडा अमर रहे ,बिरसा मुंडा की विरासत जिंदाबाद ,जल-जंगल-जमीन के लिए संघर्ष कर रहे दलित-आदिवासियों को लाल सलाम ,आपरेसन ग्रीन हंट बंद करो,आदिवासियों के संघर्षो पर दमन बंद करो,आदिवासी बंदियों को रिहा करो ,शहीद बिरसा मुंडा को लाल सलाम के नारे लगाये गए |
     


    इस गोष्ठी में संजय भट्टाचार्य (फॉरवर्ड ब्लॉक) संदीप(aisf) डॉ.अमरनाथ पासवान (सामाजिक बहिष्करण केंद्र,बीएचयू) मोनिश(sfc)नरेश राम(sc -st कमिटी) शैलेश,शुकेश (bcm) अनुराग(sev) व अन्य छात्र बुद्धिजीवी उपस्तिथि रहे |