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Monday, September 20, 2021

क्या आप कॉमरेड 'गोंजालो' को जानते हैं?




पेरू की राजधानी लीमा के एक घर पर सुरक्षा एजेंसियों की नज़र थी। क्योकि वहाँ से आवश्यकता से अधिक कचरा निकल रहा था, जबकि उस घर मे सिर्फ एक महिला रहती थी। 12 सितंबर 1992 को इस घर पर रेड पड़ी और  उस वक़्त दुनिया के सबसे सशक्त माओवादी आंदोलन के नेता चैयरमैन गोंजालो (Abimael Guzmán) को  6 अन्य कॉमरेडों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। 

जिस वक्त उन्हें गिरफ्तार किया गया, वे रणनीतिक प्रत्याक्रमण (strategic Offensive) की सैद्धान्तिक व व्यवहारिक तैयारी कर रहे थे। लगभग आधे पेरू पर 'शाइनिंग पाथ' (The Communist Party of Peru – Shining Path) का वर्चस्व स्थापित हो चुका था। 

लेकिन अब युद्ध पेरू की प्रतिक्रियावादी फुजिमोरी (Alberto Fujimori) सरकार से  नहीं बल्कि अमेरिका साम्राज्यवाद से था। अमेरिका किसी भी कीमत पर अपने पिछवाड़े दूसरा क्यूबा नहीं बनने देना चाहता था। अभी 'आतंक के खिलाफ युद्ध' का समय नहीं आया था। अमेरिका ने 'ड्रग्स के खिलाफ युद्ध' का बहाना लिया और गुपचुप तरीके से 'शाइनिंग पाथ' के खिलाफ अपनी सेना उतार दी। 

1990 के बाद दुनिया बहुत तेजी से फासीवाद की तरफ बढ़ रही थी। यह 'निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण का दौर था। यह 'इतिहास के अंत' का दौर था। 

'इतिहास के अंत' वाले इसी दौर में गोंजालो के नेतृत्व में 'शाइनिंग पाथ' ने एक नया इतिहास लिखने की ठान ली। और यह नया इतिहास, जनता का इतिहास पेरू के ग्रामीण इलाकों में, शहरों की झुग्गी बस्तियों में आकार लेने लगा।

अमेरिका ने पेरू की प्रतिक्रियावादी सरकार के साथ मिलकर भले ही इस शानदार आंदोलन को कुचल दिया हो, लेकिन 'शाइनिंग पाथ' ने दिखा दिया कि इतिहास का अंत नहीं हुआ है और इस धरती पर शोषण विहीन दुनिया  संभव है। 

इसी शोषण विहीन दुनिया के सपने को जमीन पर उतारने का प्रयास करने वाले गोंजालो ने  29 साल पेरू की यातनादाई जेल काटने के बाद इसी माह 11 सितंबर को अंतिम सांस ली।

1992 में गोंजालो को गिरफ्तार करने के बाद गोंजालो और गोंजालो के बहाने दुनिया के क्रांतिकारियों को अपमानित करने के लिए पेरू सरकार ने गोंजालो को पिंजड़े में बंद करके  मीडिया के सामने पेश किया। लेकिन गोंजालो ने बाजी पलट दी और इस पिंजड़े से उन्होंने दहाड़ते हुए कहा कि इतिहास के पथ पर यह महज एक मोड़ है और अंतिम जीत विश्व सर्वहारा की ही होगी।  आखिर शेर जंगल मे हो या पिंजड़े में वो दहाड़ना थोड़ी भूल जाएगा। 

गोंजालो की गिरफ्तारी पर बनी एक प्रतिक्रियावादी फ़िल्म 'The Last Hour' में पेरू का एक सुरक्षा अधिकारी अपने एक अधीनस्थ से कहता है कि गोंजालो इसलिए खतरनाक है क्योंकि वह न सिर्फ पेरू में क्रांति की बात करता है, बल्कि पूरे विश्व मे क्रांति की बात करता है। 

इसी फिल्म में 'शाइनिंग पाथ' का एक कॉमरेड गोंजालो के बारे में कहता है कि गोंजालो ने हमे मौत को चुनौती देने के लिए प्रशिक्षित किया है।

दर्शन के इस प्रोफेसर की जिंदगी के प्रति जिजीविषा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी एक सहअभियुक्त (Elena Iparraguirre) से 2010 में 75 साल की उम्र में विवाह रचाया। इसके लिए गोंजालो ने  लंबी भूख हड़ताल की। तब जाकर उन्हें शादी करने की इजाजत मिली। हालांकि उन्हें एक दिन भी साथ रहने का समय नहीं दिया गया।

अलविदा गोंजालो। तुम जैसे क्रांतिकारियों की शहादत से ही इतिहास का इंजन आगे बढ़ता है।

#मनीष आज़ाद

Sunday, September 19, 2021

'मालाबार विद्रोह' के 100 साल और भाजपा/आरएसएस का मुर्गावलोकन



आज से 100 साल पहले अंग्रेजों ने केरल के मालाबार क्षेत्र से 100 मुसलमानों को जबर्दस्ती मालगाड़ी में पैक किया और वहां से 140 किलोमीटर दूर कोयंबटूर जेल भेज दिया। कोयंबटूर पहुँचने पर इनमे से 64 मुस्लिम मर चुके थे। पूरी तरह बन्द मालगाड़ी में हवा पानी के अभाव में उन्होंने दम तोड़ दिया था। बाकी लोगों ने अपना पेशाब-पसीना पीकर किसी तरह अपनी जान बचाई।  बच गए लोगों ने बताया कि पूरी तरह बन्द मालगाड़ी की झिर्रियों को भी कागज़ चिपका कर बन्द कर दिया गया था।

 इसी तरह हिटलर के समय में यहूदियों को यहां से वहां ले जाया जाता था। परिणामस्वरूप हजारों यहूदी दम घुटने से मर जाते थे। 

 इस घटना को दक्षिण का 'जलियांवाला कांड' भी कहा जाता है।

प्रसिद्ध इतिहासकार सुमित सरकार ने इसे 'पोदानूर (Podanur) ब्लैकहोल' की संज्ञा दी। 

ये मुस्लिम कौन थे और अंग्रेजों को उनसे इतनी नफरत क्यो थी?

 ये मुस्लिम 'मालाबार विद्रोह' के क्रांतिकारी थे, जिन्होंने आज से ठीक 100 साल पहले साम्राज्यवाद और सामंतवाद दोनों को अपने निशाने पर लिया था और दक्षिणी केरल के मालाबार क्षेत्र के एक बड़े हिस्से में पूरे 6 माह सामंतवाद और साम्राज्यवाद से मुक्त एक समानांतर सरकार चलाई थी। उन्होंने न सिर्फ अत्याचारी सामंतों पर हमला किया बल्कि उपनिवेशवाद के प्रतीक कोर्ट, थाने, टेलीग्राफ ऑफिस, ट्रेजरी को भी अपना निशाना बनाया।

 तेलंगाना गुरिल्ला संघर्ष से करीब 16-17 साल पहले इन्होंने दिखा दिया था कि गुरिल्ला युद्ध से अंग्रेजों और उनके चाटुकार सामंतों को कैसे धूल चटाई जा सकती है। इस विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों को सेना बुलानी पड़ी। इस दमन के दौरान अंग्रेजों ने करीब 10 हजार लोगों का कत्लेआम किया और और हजारों लोगों को गिरफ्तार करके सुदूर अंडमान भेज दिया।

दिलचस्प यह है कि 100 साल बाद आज आर एस एस/भाजपा को भी इन 'मुस्लिम' क्रांतिकारियों से उतनी ही नफरत है, जितनी अंग्रेजों को थी। 

भाजपा के राम माधव ने अभी हाल में दिए बयान में इन क्रांतिकारियों को भारत का पहला तालिबानी बताया है।

नफ़रत की इंतेहा देखिये कि इस घटना से संबंधित एक मूरल (mural) पेंटिंग को केरल के तिरुर (tirur) रेलवे स्टेशन से भाजपा/आरएसएस ने जबर्दस्ती मिटवा दिया। मानो पेंटिंग मिटा देने से उनका इतिहास भी मिट जाएगा।

भाजपा/आरएसएस यहीं तक नहीं रुके। उन्होंने दबाव डालकर 'भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) की शहीदों की लिस्ट (Dictionary of Martyrs of India’s Freedom Struggle) से मालाबार विद्रोह के सभी 387 शहीदों को बाहर करवा दिया। मानो ऐसा करने से वे इतिहास से भी बाहर हो जाएंगे।

मालाबार विद्रोह के नेता  वरियमकुनाथ हाजी (Variamkunnath Kunhamed Haji) को अंग्रेजों ने अंग्रेजी राज्य के खिलाफ युद्व छेड़ने के अपराध में गोली मारकर उनके शव को जला दिया था। शव के साथ 'समानांतर सरकार' के सारे दस्तावेज भी जला डाले, ताकी भविष्य में कोई इनसे प्रेरणा न ले सके।

आज भाजपा/आरएसएस इस शानदार विद्रोह से संबंधित तथ्यों को जला रही है। क्या जुगलबंदी है। यह वही जुगलबंदी है जो 'वीर' सावरकर ने अंग्रेजों के साथ शुरू की थी।

मालाबार विद्रोह के निर्मम दमन के महज 3 साल बाद 1924 में अंग्रेजों के 'वीर' बन चुके सावरकर ने मालाबार विद्रोह पर 'मोपला' (Moplah) नाम से एक उपन्यास  लिखा और इस शानदार क्रांतिकारी घटना को एक दंगा घोषित किया जिसमें मुस्लिमों ने हिन्दुओं का कत्लेआम किया था। अंग्रेजों के मालाबार विद्रोह के दमन के बाद अब यह तथ्यों का दमन था। 

दरअसल मालाबार क्षेत्र में प्रायः हिन्दू जमींदार थे और उनकी 'रियाया' मुस्लिम थी। अंग्रेज अपने स्वार्थ में इन 'हिन्दू' जमींदारों के साथ मिलकर 'मुस्लिम' जनता का निर्मम शोषण कर रहे थे। इसी शोषण के खिलाफ यह विद्रोह था। और इसी तथ्य का इस्तेमाल करके सावरकर ने इसे मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं के कत्लेआम की संज्ञा दे दी। 100 साल बाद भाजपा/आरएसएस इसी बासी भात की खिचड़ी लोगों को परोस रहे हैं और इस शानदार सामंतवाद-साम्राज्यवाद विरोधी विद्रोह को बदनाम कर रहे हैं। 

तथ्य तो यह भी है कि इस विद्रोह में उन मुस्लिमों को भी निशाना बनाया गया था, जो अंग्रेजों की मदद कर रहे थे। लेकिन इस तथ्य पर पर्दा डाला जा रहा है।

यह बात सही है कि वरियमकुनाथ हाजी के नेतृत्व में मालाबार विद्रोह ने इस्लामिक धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया था। लेकिन गांधी के नेतृत्व वाला तथाकथित राष्ट्रीय आंदोलन भी तो तमाम हिन्दू प्रतीकों से अटा पड़ा था। तो उसे क्या कहेंगे।

दरअसल यह पूरा विवाद सतह पर तब आया जब पिछले साल मलयाली फ़िल्म डायरेक्टर आशिक अबु (Ashiq Abu ) ने मालाबार विद्रोह के मुख्य नायक वरियमकुनाथ हाजी पर फ़िल्म बनाने की घोषणा की। इस घोषणा के साथ ही उन पर और हाजी की भूमिका निभाने वाले पृथ्वीराज पर हमले शुरू हो गए। अफसोस कि दोनों ही इस हमले को सह नहीं पाए और इसी माह उन्होंने औपचारिक घोषणा कर दी कि वे फ़िल्म नहीं बनाएंगे। इस तरह दर्शक एक शानदार ऐतिहासिक घटना से 'रूबरू' होने से वंचित रह गए।

खैर, हिटलर ने भी बहुत कोशिश की थी, इतिहास को पलटने की। लेकिन इतिहास ने उसे ही पटखनी दे दी। 

चीन के क्रांतिकारी लेखक 'लू शुन' ने बहुत सही लिखा है-'स्याही से लिखा गया झूठ कभी भी खून से लिखे गए सच पर पर्दा नहीं डाल सकता।'

#मनीष आज़ाद

नोट-चित्र मशहूर पेंटर चित्तोप्रसाद भट्टाचार्य (Chittaprosad Bhattacharya) का है। आभार सहित।

Thursday, September 16, 2021

पेरियार: हमारे आधुनिक चार्वाक

 पेरियार के जन्मदिन पर




आधुनिक समय में पेरियार और डा. अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म के ठीक कोर पर हमला बोला था. जहां अम्बेडकर ने मुख्यतः वैचारिक ज़मीन से हमला बोला वहीं पेरियार ने मुख्यतः आंदोलनात्मक ज़मीन से हमला बोला. लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही था. हिन्दू कहे जाने वाले समाज का पूर्ण जनवादीकरण. हिन्दू धर्म का जिस तरह का सामाजिक ढांचा था [और है], उसमें 'सामाजिक अत्याचार' किसी भी तरह से 'राजनीतिक अत्याचार' से कम महत्व नहीं रखता. डा. अम्बेडकर की तरह ही पेरियार भी इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि इस सामाजिक अत्याचार की जड़ जाति-व्यवस्था है जिसे हिन्दू धर्म में तमाम ग्रंथों, अनुष्ठानों और तमाम भगवानों द्वारा मान्यता दी गयी है और उसका सूत्रीकरण [codification] किया गया है. यानी हिन्दू धर्म का मुख्य काम इसी जाति-संरचना को बनाये व बचाए रखना है. पेरियार मानते थे की हिन्दू धर्म एक ऐसा धर्म है जिसकी कोई एक पवित्र किताब नहीं है. कोई एक भगवान् नहीं है, जैसा कि दुनिया के दूसरे बड़े धर्मो में है. ना ही इसका कोई उस तरह का इतिहास है, जैसा यहूदी, इसाई या मुस्लिम धर्म का है. यह एक काल्पनिक विश्वास पर टिका हुआ है कि ब्राह्मण श्रेष्ठ होते है, शूद्र उनके नीचे होते हैं और बाकी जातियां अछूत होती हैं. जाति के बारे में डा. अम्बेडकर के प्रसिद्ध 'श्रेणीबद्ध असमानता' [graded inequality] को आगे बढ़ाते हुए पेरियार ने इसे आत्म सम्मान से जोड़ा और कहा कि जाति व्यवस्था व्यक्ति के आत्मसम्मान का गला घोंट देती है. उनका 'सेल्फ रेस्पेक्ट आन्दोलन' इसी विचार से निकला था.

पेरियार इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि भारत में हिन्दू धर्म 'अफी़म' नहीं बल्कि 'ज़हर' है जो अपनी जाति संरचना के कारण इंसान की इंसानियत का क़त्ल कर देती है.

दूसरी तरफ गाँधी इस जाति-आधारित धर्म को इसाई धर्म और इस्लाम धर्म की तर्ज पर एक मुकम्मल धर्म बनाना चाह रहे थे. यानी एक किताब [गीता] और एक भगवान् [राम], एक प्रार्थना [वैष्णव जन तो.....] वाला धर्म. लेकिन यह प्रयास करते हुए वे जाति व्यवस्था को बिल्कुल नहीं छूना चाहते थे. गांधी के इस ज़िद के कारण पेरियार गाँधी के प्रति डा. अम्बेडकर से भी ज़्यादा कठोर थे. पूना पैक्ट के दौरान उन्होंने डा. अम्बेडकर को सन्देश भेजा कि किसी भी क़ीमत पर गाँधी के सामने झुकना नहीं है. उनका सीधा कहना था कि गाँधी की एक जान से ज्यादा कीमती है करोड़ो दलितों का आत्म-सम्मान. पेरियार ने कांग्रेस और गाँधी को शुरू में ही पहचान लिया था. पेरियार ने कांग्रेस के राष्ट्रवाद पर कटाक्ष करते हुए उसे 'राजनीतिक ब्राह्मणवाद' कहा था.  

जाति-व्यवस्था और उपनिवेशवाद के कारण भारत की अनेक राष्ट्रीयताएँ विकसित नहीं हो पाई. बल्कि इसके विपरीत 'राष्ट्रीयताओं का जेलखाना' हो गयी. इस तथ्य को पेरियार बखूबी पहचानते थे. 1930-31 में उनकी सोवियत यात्रा ने भी उनकी इस समझ को धार दी. अलग 'द्रविड़नाडू' के लिए उनका आन्दोलन वास्तव में तमिल राष्ट्रीयता को जेल से आज़ाद कराने का आन्दोलन था. तथाकथित आज़ादी [यह दिलचस्प है की एक ओर जहां कम्युनिस्टो ने 15 अगस्त 1947 को 'झूठी आज़ादी' के रूप में इसका बहिष्कार किया, वहीं पेरियार और उनके अनुयायियों ने इस दिन को 'शोक दिवस' के रूप में मनाया और काली कमीज व काले झंडे के साथ जगह जगह प्रदर्शन किया. 

इसके बाद अलग तमिल राष्ट्र के लिए उनके उग्र आंदोलनों की वजह से ही 1957 में भारत सरकार एक क़ानून लेके आई, जिसके अनुसार अब अलग राष्ट्र की मांग करना देशद्रोह हो गया. इसी के बाद कश्मीर और पूरे उत्तर-पूर्व का जन-आन्दोलन आतंकवाद और देशद्रोह बन गया. 

महिला मुक्ति के सवालों पर पेरियार के विचार जर्मनी के मशहूर समाजवादी 'आगस्त बेबेल' की याद दिलाते हैं. पेरियार महिलाओं की पूर्ण मुक्ति के पक्षधर थे. उनके अनुसार- ''भारत में महिलायें सभी जगह अछूतो से ज्यादा बुरी दशा और अपमान का जीवन गुजारती हैं. पश्चिम में 1960 के दशक के अंत में जाकर गर्भ निरोध को महिलाओं की मुक्ति के साथ जोड़ा जाने लगा. लेकिन पेरियार काफ़ी पहले ही इसकी बात करने लगे थे. उन्ही के शब्दों में- 'दूसरे लोग महिलाओं के स्वास्थ्य और परिवार की संपत्ति के केन्द्रीयकरण के सन्दर्भ में ही गर्भ-निरोध की बात करते हैं, लेकिन मैं उसे महिलाओं की मुक्ति से जोड़ कर देखता हूँ.'

इतिहास में अगर मगर का कोई मतलब नहीं होता है, लेकिन आज को समझने में कभी कभी ये अगर मगर काम आ जाते है. डा. अंबेडकर और पेरियार के बीच वैचारिक साम्य और उनकी आपसी नजदीकी के बावजूद जमीनी स्तर पर पिछड़े वर्ग और दलितों के बीच कोई दूरगामी रणनीतिक मोर्चा नहीं बन पाया. और तत्कालीन कम्युनिस्ट नेतृत्व ने तो खैर जाति को समझा ही नहीं. बल्कि यूं कहे की तत्कालीन कम्युनिस्ट नेतृत्व ने कुछ भी नहीं समझा. ना वे राज्य को समझ पाए, ना कांग्रेस को, ना राष्ट्रीयता को. आश्चर्य की बात तो यह है कि नक्सलबाड़ी के पहले तक कम्युनिस्टों के पास क्रांति का कोई ठोस कार्यक्रम ही नहीं था.

यदि इतिहास दूसरे तरीके से शक्ल लेता और डा. आंबेडकर, पेरियार और कम्युनिस्टों में एक रणनीतिक एकता बनती तो आज भारत की शक्ल ही कुछ और होती. पाश को तब यह न कहना पड़ता कि 'मेरे दोस्तों, ये कुफ्र हमारे ही समय में होना था.'


#मनीष आज़ाद

Sunday, September 12, 2021

13 सितम्बर : राजनीतिक बंदी दिवस


 

आज ही के दिन भगत सिंह के साथी और 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट असोशिएसन' के सदस्य जतिन दास अपनी 63 दिन लम्बी भूख हड़ताल के बाद शहीद हो गए थे. उस वक्त उनकी आयु महज 25 साल थी. उनकी कई मांगो में से एक प्रमुख मांग यह थी कि क्रांतिकारियो को राजनीतिक बंदी का दर्जा दिया जाय. आज 92 साल बाद भी यह लड़ाई जारी है. आज 13 सितम्बर को भारत की कई जेलों में वर्तमान दौर के क्रान्तिकारी इसी मांग के लिए और शहीद जतिन दास को याद करते हुए 1 दिन की भूख हड़ताल करेंगे. भीमाकोरेगांव के क्रांतिकारी भी इसमे शामिल है.


आज ही के दिन इतिहास की एक और महत्वपूर्ण घटना घटी थी. अमेरिका के न्यू यार्क शहर में स्थित 'अतिका जेल' में ब्लैक पैंथर की अगुवाई में कैदियों के राजनीतिक अधिकारों सहित तमाम मांगो को लेकर काफी समय से आन्दोलन चल रहा था. अंततः 9 सितम्बर 1971 को कैदियों ने प्रिज़न गार्डों को बंधक बनाते हुए समूचे जेल पर कब्ज़ा जमा लिया. 4 दिन तक चली समझौता वार्ता विफल होने के बाद आज ही के दिन, 13 सितम्बर 1971 को अमेरिका की राज्य पुलिस ने जेल पर हमला कर दिया. इसमें हेलीकाप्टर तक का इस्तेमाल किया गया. कैदी भी बहादुरी से लड़ें. इस खूनी संघर्ष में 10 प्रिजन गार्ड सहित कुल 41 बंदी मारे गए. आज इनके और अन्य तमाम राजनीतिक बंदियों के साहस को भी सलाम करने का दिन है!


 पिछले साल 28 अगस्त को तुर्की की मशहूर मानवाधिकार वकील 'एब्रू तिमटिक' [Ebru Timtik] कैद में 238 दिनों लम्बी भूख हड़ताल के बाद शहीद हो गयी. आज उनके साहस व जज्बे को भी सलाम करने का दिन है!


अमेरिकी जेल में 16 साल गुजारने वाले लेखक 'जेरोम वाशिंगटन' का मशहूर कथन है-  'जेल में इंसान बने रहने के लिए जेल के नियमों को तोड़ना बहुत जरूरी है'.  

फासीवाद के दौर में पूरा देश ही जेलखाना हो जाता है. ऐसे में जेरोम वाशिंगटन के इस कथन को विस्तारित करते हुए कहा जाना चाहिए कि फासीवाद के इस दौर में इंसान बने रहने के लिए यह बेहद जरूरी है कि हम फासीवाद और फासीवादियो के तमाम फरमानों का पुरजोर विरोध करें और उन्हें तोड़े.

#मनीष आज़ाद

The Boy in the Striped Pyjamas: एक बच्चे की नज़र में फासीवादी दुनिया

 


हम सब अपनी आंखों से ज्यादा अपने विश्वास  (belief system) से देखते हैं। जैसे अधिकांश 'भक्त' हिंदुओं के लिए मुसलमान बुरे होते हैं। अधिकांश मध्य-उच्च वर्ग के लिए गरीब-आदिवासी-दलित गंदे होते हैं। या ज़्यादातर पुरुषों के लिए महिलाएं कमज़ोर और कम बुद्धि होती हैं। सत्ताएँ इस  विश्वास (belief system) को बनाए चीज़ रखने और उसे बढ़ाने में ऐड़ी चोटी का ज़ोर लगाए रहती हैं।

हमारे इस विश्वास  (belief system) की मोटी दीवार से टकराकर प्रतिदिन न जाने कितने निर्दोष  तथ्य (fact) लहूलुहान होते रहते हैं और दम तोड़ते रहते हैं।  लेकिन वह दृश्य भयावह होता है जब इस  विश्वास  (belief system) की मोटी दीवार से टकराकर एक बच्चा 'मर ' जाता है क्योंकि वह दूसरे बच्चे के साथ खेलने से इसलिए मना कर देता है कि वह बच्चा मुसलमान या यहूदी है। 

लेकिन कुछ विद्रोही बच्चे ऐसे होते हैं जो बड़ों के इस विश्वास  (belief system) की मोटी दीवार में सेंध लगा देते हैं और अपना एक भूमिगत संसार रच लेते हैं, जहाँ वे वह सारे काम करते हैं जो इस विश्वास  (belief system) की नज़र में निषिद्ध माने जाते हैं। 

 'The Boy in the Striped Pyjamas' फ़िल्म में नाज़ी ऑफिसर का 8 साल का बच्चा ब्रूनो ऐसा ही एक बच्चा है। जो अपने भूमिगत संसार में यातना शिविर  में रहने वाले एक यहूदी बच्चे से दोस्ती करता है, उसे चॉकलेट और खाने की अन्य चीज़ें देता है। उसके साथ चेस खेलता है।

यहूदी बच्चे के साथ ब्रूनो की पहली मुलाकात में  तथ्य और विश्वास  (belief system) की भिड़ंत साफ दिखती है। यहूदी बच्चे को घूरते हुए उसके दिमाग मे उसके इतिहास के शिक्षक का वह वाक्य गूंजता है कि यहूदी इंसानों से कुछ कम होते हैं। और जर्मन देश के महान बनने की राह में यहूदी सबसे बड़ी बाधा हैं। 

लेकिन हमें यह देखकर बहुत सुकून मिलता है कि ब्रूनो की मासूम और हमेशा कुछ तलाशती आंखे बड़ों के विश्वास  (belief system) पर भारी पड़ती है और हम एक खूबसूरत दोस्ती का आनंद लेते हैं।

घर में काम करने वाले एक यहूदी पावेल में उसे वो 'यहूदी' नहीं दिखता जिसके बारे में उसे बताया या पढ़ाया जाता है। 

ब्रूनो का पिता अपने विश्वास  (belief system) को दूसरे छोर तक ले जाता है और इसलिए हिटलर के प्रोजेक्ट को अपना प्रोजेक्ट मानकर यहूदियों के कत्लेआम में सक्रिय भागीदारी करता है। 

इस विश्वास  (belief system) का भयावह रूप उस संवाद में है जिसे सुनकर आपको शायद फ़िल्म को पाॅज़ करना पड़े। पास के चिमनी से उठते धुंए में जो बुरी गंध है, उसके बारे में ब्रूनो की माँ के पूछने पर एक जूनियर नाज़ी ऑफिसर नफ़रत से कहता है- ''ये जलते हैं तो और भी बुरी गंध मारते हैं।'' यह सुनकर दर्शकों की तरह ब्रूनो की माँ भी सन्न रह जाती है। सिहर जाते हैं हम कि  लोग इतनी नफ़रत कहाँ से लाते हैं? बहरहाल ब्रूनो की माँ अपने विश्वास  (belief system) को इस हद तक ले जाने में 'सक्षम' नहीं है। 

इसके बाद वह अपने पति से झगड़ कर  बच्चों सहित अपने गाँव जाने का निर्णय करती है, ताकि बच्चों को इस भयावह माहौल से बचाया जा सके।

लेकिन इसी बीच भूमिगत तरीके से जब ब्रूनो यातना कैम्प की इलेक्ट्रिक बाड़ के पास अपने यहूदी दोस्त से मिलता है तो उसका दोस्त घबराया हुआ है। उसका पिता खो गया है। ब्रूनो कहता है कि हम मिलकर खोजते हैं, मुझे अंदर (यातना शिविर में) आने दो। यहूदी दोस्त कहता है कि अंदर आने के लिए तुम्हे हमारी ड्रेस पहननी होगी (धारीदार पायजामा, Striped Pyjamas )। 

अब यातना शिविर में यहूदियों की ड्रेस में नाज़ी अफ़सर का बेटा भी है।  अपने यहूदी दोस्त के पिता को यहाँ वहां खोजता और चुपके से देखी 'यातना शिविर' पर दुनिया को दिखाने के लिए बनी 'साफ सुथरी प्रोपैगैंडा फ़िल्म' से इस बदसूरत हक़ीक़त की तुलना करता और परेशान होता।

इसी बीच ब्रूनो का पिता उसी यातना शिविर के यहूदियों  को गैस चैंबर में भरकर मारने का प्लान कर चुका है। क्योंकि काम करते करते अब सभी कमज़ोर और बीमार हो चुके हैं।

और यातना शिविर में यहूदियों की पहचान उनके कपड़ों से ही तो है। विडम्बना यह है कि वह बच्चा अपने दोस्त का धारीदार पैजामा पहन कर नाज़ी शिविर में दाख़िल हो जाता है।

इसके आगे लिखना मेरे लिए संभव नहीं। मेरे शब्दों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल रही।

अपने झूठे विश्वास  (belief system) का शिकार सिर्फ वे ही नहीं होते, जिनके खिलाफ यह विश्वास  (belief system) होता है। बल्कि वे भी होते हैं जो इस विश्वास  (belief system) में जीते हैं। 

यानी एक तरह से  इसका शिकार पूरी मानवता होती है।

पाश के शब्दों में कहें तो 'अगर तुम हमे भेड़ो-बकरियों की तरह क़ैद में रखते हो तो तुम भी हमारी रखवाली करते हुए कुत्ता होने को अभिशप्त हो।'

यह फ़िल्म इस समय नेटफ्लिक्स पर मौजूद है।


#मनीष आज़ाद

Monday, September 6, 2021

'जसवंत सिंह खालरा': लावारिस लाशों दा वारिस



 एक 'शव' पोस्टमार्टम के लिए लाया जाता है। डॉक्टर ने देखा कि सिर में गोली लगने के बावजूद उसकी सांस अभी चल रही थी। जब डॉक्टर ने पुलिस अफसर का ध्यान इस ओर दिलाया, तो वह पुलिस अफसर उस जीवित 'शव' को लेकर वापस चला गया और कुछ देर बाद मृत शव के साथ वापस लौटा और शव का पोस्टमार्टम करने के लिए डॉक्टर को सुपुर्द कर दिया।

यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि पंजाब के किसी शहर में घटी घटना है। दिन था - 30 अक्टूबर 1993

मशहूर खोजी पत्रकार जोसी जोसेफ (Josy Joseph) ने हालिया प्रकाशित अपनी महत्वपूर्ण किताब 'The Silent Coup' में इस घटना का जिक्र किया है।

यह कोई अलग-थलग घटना नहीं थी। बल्कि पंजाब में 'मिलिटेंसी' के दौरान (1985 से 95) करीब 25 हजार नौजवान सिखों को वहां की पुलिस ने 'गायब' कर दिया था।

इन 'गायब' लोगों को जिसने खोज निकाला, उसका नाम था- 'जसवंत सिंह खालरा'। 'खालरा' उस वक़्त अकाली दल की मानवाधिकार इकाई के जनरल सेक्रेटरी थे। 

लेकिन इस खोज की बड़ी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी। 

आज ही के दिन यानी 6 सितंबर (1995) को घर से दिनदहाड़े पंजाब पुलिस ने उनका अपहरण किया और उन्हें भी 25 हजार लोगों की तरह 'गायब' कर दिया। 

सालों बाद स्पेशल पुलिस अफसर कुलदीप सिंह ने CBI को दिए अपने बयान में बताया कि पुलिस हिरासत में तमाम यातनाएं देकर 24 अक्टूबर 1995 को उनकी हत्या कर दी गयी थी और लाश के कई टुकड़े करके सतलज नदी में फेंक दिया गया था। 

बताने की जरूरत नहीं कि यह 'के.पी. एस. गिल' का काल था, जो समाज के एक छोटे हिस्से और मीडिया के लिए हीरो था, तो समाज के निचले बड़े हिस्से के लिए कसाई।

जसवंत सिंह खालरा ने इन 'गायब' लोगों का पता लगाने के लिए श्मशान घाट का रुख किया। पंजाब में लावारिस लाशों को जलाने के लिए लकड़ियों का खर्च म्युनिसिपलिटी से आता है। खालरा ने बहुत धैर्य और मेहनत से म्युनिसिपलिटी से यह आंकड़ा निकलवाया कि प्रतिदिन कितने कुंतल लकड़ी इशू हुई है। एक लाश को जलाने के लिए करीब 3 कुंतल लकड़ी लगती है। इसके आधार पर गणना करके एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खालरा ने यह सनसनीखेज रहस्योद्घाटन किया कि 1984 से 94 के बीच सिर्फ तीन शमशान में क्रमशः 400, 700 और 2000 लावारिस लाशों को जलाया गया है। मांग की गई कि ये लोग कौन हैं, इनकी सूचना उपलब्ध कराई जाय और इसकी जांच कराई जाए। हालांकि यह आंकड़ा भी वास्तविक आंकड़े से बहुत कम था, क्योंकि पुलिस आमतौर पर एक ही चिता पर 3-4 लाश एक साथ जलाती थी। इसलिए वास्तविक आंकड़ा 3 से 4 गुना ज्यादा हो सकता है।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के जवाब में 'के.पी. एस. गिल' ने भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और बेहयाई से सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जिन्हें गायब बताया जा रहा है, वे वास्तव में अमेरिका कनाडा में कमाई कर रहे हैं। और यहां मानवाधिकार संगठन पुलिस को बदनाम करने पर तुले हुए हैं।

इसके बाद खालरा ने अपने इन दस्तावेजों के साथ पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया। लेकिन आश्चर्य कि हाईकोर्ट ने खालरा का केस सुनने लायक ही नहीं माना और खारिज कर दिया।

उसके बाद खालरा ने कनाडा और अमेरिका का रुख किया ताकी विश्व जनमत को प्रभावित करके भारत पर दबाव डाला जा सके। इसी प्रक्रिया में जसवंत सिंह खालरा ने कनाडा की संसद में अपना प्रसिद्ध भाषण दिया, जो उनका आखिरी भाषण साबित हुआ। क्योकि वहां से लौटते ही उनका अपहरण कर लिया गया और हत्या कर दी गयी। 

कनाडा की संसद में उन्होंने भरे गले से कहा कि हम कुछ ज़्यादा नहीं मांग रहे। हम सरकार से बस 'डेथ सर्टिफिकेट' मांग रहे हैं।

भगतसिंह की तरह ही जसवंत सिंह खालरा भी एक क्रांतिकारी परिवार से आते हैं। उनके दादा हरनाम सिंह 'गदर आंदोलन' के संस्थापको में से थे। 'कोमागाटू मारु' घटना में भी वे शामिल थे।

लेकिन विडंबना देखिये कि अमृतसर में खालरा के निवास स्थान से महज कुछ दूरी पर स्थित 'गुरु नानक देव विश्वविद्यालय' के 'मानवाधिकार कोर्स' में जसवंत सिंह खालरा का जिक्र तक नहीं है। सच तो यह है कि भारत के किसी भी सरकारी मानवाधिकार कोर्स में खालरा का जिक्र नहीं है, जबकि कनाडा में 3 और अमेरिका में 1 सड़क का नाम जसवंत सिंह खालरा के नाम पर है। 

लेकिन दुःख इस बात का है कि भारत के मानवाधिकार संगठन भी उन्हें उतनी तवज्जो नहीं देते, जिसके वे हकदार हैं।

लगभग ऐसी ही कहानी कश्मीर के मानवाधिकार कार्यकर्ता जलील अंद्राबी (Jalil Andrabi) की थी। वे भी कश्मीर में लावारिस कब्रों का पता लगा रहे थे और उन्हें डॉक्यूमेंट कर रहे थे।

8 मार्च 1996 को उनका भी खालरा की तरह ही अपहरण कर लिया गया और 27 मार्च को सुबह झेलम में उनकी लाश तैरती पायी गयी। उनके अपहरण और हत्या के पीछे सेना के मेजर अवतार सिंह का हाथ था, जिसे अरुंधति राय ने अपनी मशहूर किताब 'अपार खुशियों का घराना' में एक पात्र बनाया है। बाद में देश से भागकर अवतार सिंह ने अपने परिवार के सदस्यों को गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी।

सत्ताएं रात के अंधेरे में जिनका कत्ल करती हैं, दिन में उसी के भूत से डरती भी हैं। खालरा जैसे मानवाधिकार योद्धाओं का कत्ल भी इसी डर के कारण होता है। 

कनाडा की संसद में दिए अपने अंतिम भाषण में जसवंत सिंह खालरा ने एक लोक कथा सुनाई थी कि कैसे अंधेरे के साम्राज्य को छोटे छोटे दिए चुनौती देते है।

आज यह लोककथा खुद 'खालरा' या 'अंद्राबी' जैसे लोगों पर सटीक बैठती है, जो भले ही अंधेरे के साम्राज्य को समूल नष्ट न पाएं, लेकिन अंधेरे के साम्राज्य में सेंध लगाने में जरूर कामयाब हो जाते हैं।

महादेवी वर्मा के शब्दों में कहें तो एक दीपक भले ही दुनिया के तमाम अंधेरे को दूर नहीं कर सकता, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि दुनिया का सम्पूर्ण अंधकार मिलकर भी एक दीपक से उसकी रोशनी नहीं छीन सकता।

*शीर्षक, 'इंडियन एक्सप्रेस' में पिछले साल इसी दिन छपे एक लेख से साभार।

#मनीष आज़ाद