Powered By Blogger

Sunday, April 26, 2020

बलात्कार और बलात्कार की संस्कृति की समस्या।

कोरोना महामारी के कारण हुए लॉक-डाउन में छात्र-मशाल का (अप्रैल-मई )अंक ऑनलाइन उपलब्ध है।

                         लेख संख्या- 3



:- राधिका और अंशुल
(दोनों परा-स्नातक की छात्राएं हैं जो वर्तमान में बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में अध्ययनरत हैं।)

अनुवादः अनुपम


यह कोई नई बात नहीं है कि भारत में महिलाओं को ‘दोयम दर्जे का नागरिक’ माना जाता है। जो आम तौर पर या तो ‘कमजोर व दब्बू‘हैं’ या इसी रूप में जानी जातीं हैं। उन्हें किसी काम के लायक नहीं समझा जाता है,सिवाय लैंगिक नियंत्रण व हिंसा, पराधीनता एवं मर्यादाहीन जीवन के । ये विचार किसी भी समाज के लिए समस्या का कारण है लेकिन इस तरह के विचार काफी लंबे समय से हमारेसमाज में बने हुए हैं। इसके साथ साथ ये सब समस्याएं अधिकांशतः अनियंत्रित बने हुए हैं।

इस तरह के विचार व संस्कृति एक बड़ी समस्या का अंग हैं जिसे ‘बलात्कार की संस्कृति’ कहा जाता है। इस शब्द के प्रति लोगों में गलत धारणा बनी हुई है। कई लोग मानते हैं कि बलात्कार ‘संस्कृति’ का हिस्सा नहीं है। संस्कृति का अर्थ विचार, विश्वास, मानक, रीति-रिवाज और खास लोगों या समाज का सामाजिक व्यवहार है, लिहाजा यहाँ तक कि अपराध, सामाजिक बुराइयाँ, स्त्री-द्वेष, पितृसत्ता आदि संस्कृति का अंग हैं। बलात्कार की संस्कृति सामाजिक परिवेश से संबंधित है, जिसमें लिंग एवं यौनिकता के इर्दगिर्द निर्मित प्रतिगामी समाजिक विश्वास एवं मानकों के चलते बलात्कार एवं दरिंदगी भरा व्यवहार जारी है।

इस तरह का व्यवहार, नजरिया, अवधारणा ही बलात्कार की संस्कृति के लिए जिम्मेदार है। लैंगिक व महिलाओं के ऊपर बनने वाले चुटकुलें जो आमतौर पर सिर्फ माजाक लगता है वास्तव में ये भी यौनिक हिंसा एवं बलात्कार की तरह ही हानिकारक है। जितना हम इस तरह के व्यवहार को स्वीकार करने से नफरत करते हैं, दिन-प्रतिदिन की गतिविधियाँ, व्यवहार, अवधारणाएं, वार्तालाप ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं जो बलात्कार को और समान्य बनाते हैं। उदाहरण के लिए, महिलाओं को एक वस्तु समझना, उनको देखकर सिटी बजाना, गालीयां देना जैसे रंडी बुलाना, बलात्कार के लिए पीड़िता को दोषी ठहराना, बलात्कार के ऊपर चुटकुले बनाकर,बलात्कार का मज़ाक बनाना,लड़ाई झगड़े में किसी को नीचा दिखाने के लिए उनकी महिलाओं के नाम से गाली देना, महिलाओं के सम्मान को परिवार के सम्मान से जोड़ना, यौन हमले से पीड़ित महिलाओं का बहिष्कार करना आदि। बलात्कार जैसी समस्याओं को बहुत ही कम गंभीरता से लेना व इसके प्रति उदारभाव रखना ये सब का परिणाम बलात्कार की घटनाओं के रूप में होता है।

पितृसत्ता से स्त्री द्वेष एवं लिंग-भेद पैदा होता है और इन दोनों के विभिन्न पहलुओं का सामान्यीकरण बलात्कार की संस्कृति को जन्म देता है। लेकिन बलात्कार की संस्कृति के लिए कौन ज़िम्मेदार है? कोई व्यक्ति?  परिवार? या समुदाय? या केवल कुछ खास समुदाय? क्या मीडिया को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? या फिर राज्य-व्यवस्था को ? लेकिन हम जब इसकी जांच पड़ताल करते हैं तो पातें हैं कि इसके लिए ऊपर गिनाई हुए सारी संस्थाएं जिम्मेदार हैं। अधिकतर व्यक्ति, परिवार, पड़ोस, संस्थाएं और यहाँ तक कि राज्य की तरह ही भारी-भरकम संस्थाएं और उसकी राज्य मशीनरी बलात्कार की संस्कृति  के लिए जिम्मेदार होती है।

उदाहरण के लिए हमें अपने स्वयं के घरों से बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। बलात्कार के ऊपर बनने वाले चुटकुले का धड़ले से प्रयोग, कमोबेश प्रत्येक घर में होने वाले वैवाहिक बलात्कार, जहाँ पर विवाह के बाद सहमति को महत्व नहीं दिया जाता है, ये सब क्लासिकीय उदाहरण हैं कि यही समाज किस तरह से बलात्कार की संस्कृति के लिए जिम्मेदार है। लड़कियों को कहा जाता है कि वे पुरुषों के इर्दगिर्द पूरी तरह से अपने आप को ढक कर रखें क्योंकि महिलाओं के शरीर का कोई भी अंग खुला होने पर उत्तेजनात्मक रूप से पुरुषों के लिए आकर्षण का काम करती है और एक तरह से पुरुषों को ‘आमंत्रित करता है’। इस तरह के उदहारण से पता चलता है कि यौन हिंसा से पीड़ित एक पीड़िता पर ही उसके पीड़ित होने का दोष मढ़ दिया जाता है। भारतीये फिल्मों में आइटम सांग्स और फुहड़ गीतों के माध्यम से महिलाओं का वस्तुकरण किया जाता है। इन गानो और विज्ञापनों के जरिये अप्रत्यक्ष रूप से उनकी सहमति को महत्वहीन ठहराया जाता है और उनका चित्रण ऐसे किया जाता है कि मानों वो कोई इंसान नहीं बल्कि यौनिक सुख देने वाली कोई वस्तु है। नायक की तरफ नायिकाओं को अक्सर रीझते हुए दर्शाया जाता है, जो उनकी निजता में खलल डालता है, उसकी सहमति नहीं लेता, शारीरिक आत्मीयता के लिए उसे बाध्य करता है, उसकी लैंगिकता की अनदेखी करता है। कबीर सिंह नामक हालिया फिल्म इसका उदाहरण है। इस तरह की फिल्में दर्शकों को गलत संदेश देती हैं और इन कृत्यों को सामान्यीकृत करती हैं। दुखद है कि यहाँ तक राज्य मशीनरी भी, जिसको लेकर हम सोचते हैं कि उसके पास इस तरह की यौन-हिंसा के विरुद्ध महिलाओं की रक्षा करने के लिए संस्थाएं हैं, लेकिन ये सभी ख़ुद इन समस्याओं को बनाये रखने में इस व्यवस्था का हिस्सा है। बलात्कार के आरोपी जो शक्तिशाली वर्ग से आते हैं इन सबको को सज़ा दिलाने के बजाय उन सभी आरोपियों को संसद के लिए चुनना, जो महिलाओं के लिए कानून बनाते हैं, स्वयं में इस व्यवस्था को असंवेदनशील बॉडी के रूप में दर्शाता है। आखिर ऐसे लोग संसद में जाएंगे,जो खुद रेप के आरोपी हैं और उनसे हम उम्मीद करेंगे की वो महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानून बनायेगें,ये बहुत ही अंतर्विरोधी बात है। पुलिस-तंत्र की धीमी करवाई, अयोग्य न्यायपालिका आदि ये सब के सब भी इस समस्या के लिए बराबर जिम्मेदार हैं।

समस्या का अंग होने का आवश्यक रूप से यह अर्थ नहीं है कि वह बलात्कारी बनने जा रहा है लेकिन इसका निश्चित रूप से यह अर्थ है कि वह संभावित बलात्कारी बन सकता है या संभावित बलात्कारी को काफी हद तक संरक्षण प्रदान कर सकता है यानि कि समस्या को बढ़ा सकता है।

बलात्कार की संस्कृति महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए नुकसानदेह है। यह महिलाओं को स्वतंत्रत रहने, उनके गरिमामय और सुरक्षित जीवन जीने के अधिकारों का हनन करती है। साथ ही साथ उनके जीवन को भय, अपराधबोध,अवसाद एवं खुद को हानि पहुँचाने जैसी स्थिति में पहुँचा देती है। इसके अलावा यौन उत्पीड़न पर उनकी समझदारी को भी उलझा देती है कि यौन उत्पीड़न क्या है और क्या नहीं है। बहुत सी महिलाएं,पीछा करने एवं छेड़खानी जैसे व्यवहारों को इसलिए नजरअंदाज कर देती है या इसको एक गंभीर समस्या के रूप में चिन्हित नहीं कर पाती है क्योंकि समाज में ऐसी घटनाओं और हरकतों को सामान्य व स्वाभविक बना दिया गया है। पुरुषों के मामले में, बलात्कार की संस्कृति पुरुषों के साथ होने वाले बलात्कार को महत्वहीन बनाती है और उसकी अनदेखी करती है। यह अनदेखी बहुत से पुरुषों को आक्रामक,चिड़चिड़ा और हिंसक बनाती है। इसलिए बलात्कार की संस्कृति को हमारे समाज की एक गंभीर समस्या के रूप में चिन्हित कर,एक प्रभावी और दीर्घकालिक समाधान ढूंढने के लिए ठोस कदम लेने की जरूरत है।

नवीनतम सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारतीय पुलिस ने 2017 में बलात्कार के 33,658 मामले दर्ज किए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में हर 16 मिनट में एक महिला का बलात्कार होता है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2017 का डाटा बताता है कि भारत में 93 प्रतिशत बलात्कार उन लोगों द्वारा किए गए है जो पीड़ित के परिचित थे। बलात्कार भारतीय दंड संहिता के अनुसार गैर-जमानती अपराध है। लेकिन अधिकतर आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में जमानत दे दी जाती है। अभियुक्तों को अक्सर पुलिस, नेताओं या यहाँ तक कि वकीलों के द्वारा संरक्षण प्राप्त होता है। भारत में बलात्कार की समस्या सिर्फ एक कानूनी मुद्दा नहीं है, क्योंकि इसके पीछे हमने इसके सामाजिक पृष्टभूमि पर काफी बिस्तार से चर्चा की है इसलिए कोई भी इसके सामाजिक पहलू की अनदेखी नहीं कर सकता है।

हमारे पास भारत में एक पितृसत्तात्मक समाज है, जो पुरुषों को अधिक महत्व देता है। बच्चे बहुत ही कम उम्र में इसे अपने जे़हन में बसा लेते हैं। लड़को की तुलना में लड़की की इच्छाओं, उसकी राय और पसंद-नापसन्द को उतना महत्वपूर्ण नहीं समझता जाता है। लड़कीयों को बचपन से ही आज्ञाकारी होना सिखाया जाता है।

दिन-प्रतिदिन होने वाली बलात्कार की घटनाएं बहुत से भारतीयों के गुस्से से भर देती है। इसी गुस्से में कुछ लोग बलात्कारियों के लिए फाँसी की सजा की माँग करने लगते हैं। इसके अलावा वो सरकार से मांग करने लगते हैं कि अपराधियों को सार्वजनिक रूप से फाँसी दी जाए। इस से बलात्कार तो नहीं रूकते लेकिन इस तरह की मांग देश में हिंसक प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलता है।

6 दिसंबर 2019 को, पुलिस ने हैदराबाद बलात्कार मामले के सभी चार आरोपियों को कथित रूप से फर्जी मुठभेड़ में गोली मार दी। बहुत से भारतीयों ने “न्याय” को अंजाम देने के लिए पुलिस अधिकारियों की प्रशंसा की। सोशल मीडिया पर चल रहे पोस्ट और वीडियोज में साफ देखा जा सकता था कि हैदराबाद शहर में महिलाएं मिठाइयाँ बांट रही हैं और हत्याओं का जश्न मना रही हैं। बलात्कार के मामले में बहुत ही कम लोगों को सज़ा मिलना (अधिकतर दोषियों को साक्ष्य और गवाह के आभाव में छोड़ देना)और देश की न्यायिक प्रणाली की खामियाँ एक बेहतर न्याय के रास्ते में बाधक बनी हुई हैं।

हालाँकि सरकार ने बलात्कारियों की सज़ा की अवधि को दुगुनी करके 20 साल कर दिया है लेकिन नागरिक समाज के कार्यकर्ता कानूनों के त्वरित क्रियान्वन की मांग निरंतर कर रहे हैं।

अक्सर यह समझा जाता है कि कड़े और सख्त कानून बड़े बदलाव ला सकते हैं। लेकिन सख्त कानून है क्या? कानून प्रभावी होना चाहिए और जाँच एजेंसी और अभियोजन पक्ष को और मजबूत एवं कुशल होना चाहिए। सरकार को अवश्य ही एक विशेष यूनिट की स्थापना करनी चाहिए जो विशेषरूप से यौन अपराधों से निपटने के लिए अधिकारियों को भर्ती करे और उन्हें प्रशिक्षित करे और डॉक्टरों, फोरेंसिक विशेषज्ञों, रेप पीड़ितों और मनोवैज्ञानिकों तक आसानी से पहुँच की व्यवस्था करे। सरकार और कानून के तरफ से पीड़ितों को इतना भरोसा देना चाहिए की वो आश्वस्त होकर न्याय के लिए आगे आएं। जितने भी अपराध पंजीकृत होते है सभी को अवश्य ही इस यूनिट के द्वारा फास्ट ट्रैक अदालतों का उपयोग करके महीने भर के भीतर निपटाया जाना चाहिए। पहले से ही भारतीय पुलिस बल के ऊपर काफी भार और काम है और अधिकतर पुलिस बल असंवेदनशील होते हैं और साथ की साथ उनके कई तरह के कामों से निपटना होता है। भारतीय पुलिस से यह आशा नहीं की सकती है कि वो इस गंभीर सामाजिक मुद्दे में उतना लगन और ईमानदारी दिखाए जितना इस अति संवेदनशील मुद्दों में जरूरत होती है। अपराधियों और महिलाओं पर अपना विशेषाधिकार समझने वाले लोगों के मन में इतना भय अवश्य होना चाहिए की देश की न्याय-कानून व्यवस्था पीड़ितों के लिए अनुकूल और पक्षधर है न की आरोपियों और अपराधियों की। भारत में यौन हिंसा को रोकने के लिए अवश्य ही ऐसा महौल होना चाहिए जिससे की महिलाएं कभी भी खुद को कमतर महसूस ना करें बल्कि इसके खिलाफ पितृसत्तात्मक नजरिए व परंपराओं को खत्म करने के लिए मजबूती से आगे आये। 

हाल ही में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने परिवहन मालिकों से रात वाली शिफ्ट में महिलाओं को भर्ती करने और काम से दूर रखने का आदेश दिया है। उन्होंने इस बात पर जोर देकर कहा कि अपने आप को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी खुद महिलाओं की है।इस तरह का दृष्टकोण बहुत ही भ्रमित करने वाला है। क्योंकि इसके लिए जिम्मेदार पुरुषों तो ठहराया जाना चाहिए जिनके कारण कार्य स्थलों पर महिलाएं असुरक्षित महसूस करती है। इस समस्या का पूरी तरह से उन्हीं से लेनादेना है और महिलाओं से उसका कोई संबंध नहीं है। इस समस्या का कारण स्त्री-के प्रति नफरत की संस्कृति, आक्रामकता और महिलाओं के यौन शोषण को सामान्य घटना मानने की संस्कृति है। इस तरह की संस्कृति को बदलने का प्रयास शुरू करने के लिए  हमे पुरुषों के चारों ओर गंभीर और समझदारी भरा बातचीत शुरू करने की जरूरत है, जिसकी शुरुआत स्कूलों, सार्वजनिक मंचों और उच्च कार्यालयों में होनी चाहिए। लड़कों को सिखाया जाना चाहिए कि महिलाओं के बारे में वाहियात ढंग से बात करना, लड़कियों को अपशब्द कहना,गलत टिप्पणी करना और उन्हें लेकर झूठ बोलना गलत और एक तरह का अपराध भी है । इस काम को अकेले माता-पिता पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसे प्राथमिक स्कूलों से लेकर आगे की पढ़ाई तक स्कूल के पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए, जहाँ पर इस तरह के दृष्टिकोणों को गढ़ा जाता है। पुराने विद्यार्थियों के लिए, लैंगिक संवेदीकरण कक्षाएं और टेस्टों को अनिवार्य करना चाहिए। भारत में महिलाओं के विरुद्ध अपराध इस कदर गहराई से जड़ जमाए हुए है कि हमें बुनियादी पठन एवं लेखन में संवेदीकरण के कार्य को प्राथमिकता से लागू करवाना चाहिए। लड़कियों को सशक्त, मुखर और अपराधों के प्रति असहिष्णु होने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, फिर वे चाहे छोटे ही क्यों न हों।

कार्यस्थलों पर उन पुरुषों पर अवश्य ही कार्रवाई होनी चाहिए जो यौन आधारित चुटकुले करते हैं। हमें यौनिक आक्रमण को हल्के में लेना बंद कर देना चाहिए क्योंकि यह असम्वेदनशीलता की ओर ले जाती है, लापरवाही के साथ शुरू होती है और अंततः यौन हिंसा को सामान्यीकृत करती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी पदाधिकारियों और रोल मॉडल्स को महिलाओं को उनके पहनावे की पंसद या काम के घंटों के लिए दोष देना बंद कर देना चाहिए क्योंकि ये सब चीज़ों को दोष देने और भारत को महिलाओं के लिए एक सुरक्षित स्थान बनाने में कोई संबंध नहीं है। इसके अलावा, ऐसी फिल्मों को कतई भी बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए जो पितृसत्ता एंव स्त्री-द्वेष या लिंग-आधारित भेदभाव को बढ़ावा देती हैं। ऐसे गानों को भी पार्टियों में या कही भी नहीं बजाना चाहिए जो महिलाओं को वस्तु के रूप में पेश करती हैं। रात के खाने के समय दोस्तों एवं परिवार के साथ लैंगिक संवेदनशीलता पर होने वाली प्रतिदिन चर्चाएं प्रभावी कदम हो सकती है।

इस प्रकार से हमारा मानना है कि लड़के स्वाभाविक रूप से हिंसक नहीं होते हैं; पितृसत्तामक रूपी संस्कृति उन्हें असंवेदनशील बनाते हैं। अतएव, हर व्यक्ति समस्या का हिस्सा नहीं है लेकिन हर व्यक्ति समाधान का हिस्सा बन सकता है।



Saturday, April 25, 2020

दिल्ली और कश्मीर में कार्यकर्त्ताओं एवं पत्रकारों की दुर्भावनापूर्ण खोज बन्द की जाये तथा कठोर कानून यूएपीए को रद्द किया जाये।



24 अप्रैल, 2020

पिछले दो सप्ताहों के दौरान नई दिल्ली में दिल्ली पुलिस द्वारा अनेकों कार्यकर्ताओं और छात्रों को लक्षित एवं परेशान किया गया है। खुले फर्द बयानों के तहत काम करती पुलिस उन व्यक्तियों, जिनमें से कई कोविड-19 जनित अनियोजित लॉक डाउन के चलते भोजन एवं अन्य जरूरी आपूर्त्ति से मरूहम लोगों एवं मजदूरों को अपरिहार्य रिलीफ प्रदान करने में लगे हुए हैं, को फरवरी 2020 के अन्त में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा को भड़काने और उसमें शामिल होने के आरोप में फंसाने की कोशिश कर रही है। अभी तीन कार्यकर्त्ताओं- जामिया मीलिया इस्लामिया के मीरन हैदर एवं सफूरा जरगर और जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद को यूएपीए जैसे कठोर कानून और आईपीसी की कई संगीन धाराओं में आरोपित किया गया है। 

इन आरोपों को कतई अलग से नहीं देखना चाहिए। बल्कि ये साम्प्रदायिक एवं जन विरोधी नागरिक संशोधन कानन एवं राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के खिलाफ उभरे जोरदार जनवादी अधिकार आन्दोलन को कई तरीके से दबाने की धारावाहिकता में उठाये गए कदम हैं। यह नोट करना चाहिए कि इन व्यक्तियों को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा फैलाने  का आरोप लगाकर राज्य वस्तुतः न्याय का पूर्ण उपहास कर रहा है। 

किसने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में को हिंसा में विध्वंश किया, वह अविवादित था। हालांकि, इसके वास्तविक दोषियों एवं आयोजकों को न केवल स्वतंत्र छोड़ दिया गया है, बल्कि उन्हें पुलिस एवं प्रशासन की सुरक्षा भी प्रदान की गई है। अनुराग ठाकुर, कपिल मिश्रा और रागिनी ठाकुर जैसे भाजपा नेताओं, जिनके भड़काऊ एवं साम्प्रदायिक भाषणों को रिकॉर्ड किया गया, जिसमें मुसलमानों और सीएए, एनआरसी एवं एनपीआर विरोधियों के खिलाफ हिंसा करने के आग्रह किये गये अभी तक उन्हें पूछताछ तक नहीं की गई। अनेकों आरएसएस एवं बजरंग दली कार्यकर्त्ताओं, जिन्हेंने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा एंव तोड़-फोड़ करने के लिए हिन्दुत्व भीड़ को गोलबन्द किया और नेतृत्व दिया, पर मुमदमा चलाया नहीं गया है। अनेकों पुलिसकर्मीयों जिन्होंने बर्बरतापूर्वक मुस्लिम युवकों पर हमला किया, सक्रियता के साथ हिन्दुत्व की भीड़ को मदद किया, वे अभी भी दण्डमुक्त होकर गलियों में पेट्रॉलिंग कर रहे हैं और खाना और राशन विहीन दिल्ली के असहाय एवं भूखमरी के शिकार निवासियों पर बर्बरता कर रहे हैं। 

हालांकि, यह सब राजधानी में होता है, कश्मीर की हालत भी अगर बदतर नहीं है तो ऐसी ही है। जबकि भारत में लाक डाऊन 22 मार्च, 2020 से शुरू हुआ, कमश्मीर में 5 अगस्त, 2019 को धारा 370 को हटाने के बाद से ही लाक डाउन है, जिससे कश्मीरी जनता को अमावनीय शारीरिक एवं मानसिक क्षत्ति पहुंच रही है। आवाजाही की कमी, संसाधनों के अभाव, सूचनाओं पर पाबन्दियां, काम और शिक्षा में व्यवधानें, जिनका, देश की जनता सामना अभी कर रही है, कश्मीरी जनता के जीवन में यह सब पिछले 9 माह से ही चल रहा है। 

देश भर में मेडिकल सुविधाओं की कमी है और कश्मीर में यह कमी और ज्यादा है, जहां डॉक्टर बनाम मरीज का अनुपात देश के औसत से काफी कम है। मसरत जहरा, मुश्ताक गानेई और गौहर गिलानी जैसे पत्रकारों ने कश्मीरी जनता, खासकर कोविड-19 वायरस के फैलने की अवधि में, द्वारा झेली जा रही कठिनाईयों के दस्तावेजीकरण के प्रयास किये गए तो राज्य उनसे नाराज हुआ और उन्हें यूएपीए एवं आईपीसी की कई धाराओं के तहत आरोपित किया गया है। ध्यान देने की बात है कि पत्रकार परजादा आशिक, जिन्होंने कश्मरि से कोविड-19 किटों के जम्मू भेजने की कार्यवाही का पर्दाफाश किया, को भी इसी प्रकार आरोपित किया गया। यह हमारे समय का गंभीर प्रतिबिम्ब है कि यहां तक कि पत्रकारिता के कर्त्तव्य के पालन को भी आतंकी कार्रवाई माना जाता है। 

भारत की मुख्य भूमि में मुसलमानों को लक्षित और दरकिनार करना और कश्मीरियों पर सैनिक दमन चलाना भारतीय राज्य के लिए कोई नई बात नहीं है। हालांकि, एक ऐसे समय में जब व्यापाक जनता की भौतिक हालतों में काफी गिरावट आई हैं और राज्य ने एक ब्राह्मणवादी हिन्दुत्व फासीवादी चरित्र अपना लिया है, इन कार्रवाईयों को हिन्दू राष्ट्र स्थापित करने के कए बड़े अख्यान के हिस्से के तौर पर देखना चाहिए। 
सीएए, एनआरसी एवं एनपीआर को कोविड-19 महामारी के दौरान भी जारी रखने, मरकज को ‘कोरोना जिहाद’ का हिस्सा बताने, आवश्यक सेवाओं को प्रदान करने वाले मुसलमानों का बहिष्कार करने और मुसलमानों (गर्भवती महिलाओं समेत) को मेडिकल सुविधा न देने की प्रयासों को मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। मुख्य धारा की मीडिया ने लोक विमर्श में पूर्वाग्रही एवं कट्टरता पूर्ण भड़काऊ हेडिंग डालकर एवं संदिग्ध रिपोर्टिंग कर साम्प्रदायिक अख्यान को घुसेड़ा है। 

आज भारतीय जनता का एक बड़ा हिस्सा भाजपा नीत केन्द्र सरकार द्वारा लाकडाउन के दौरान भोजन और दूसरे राशन देने की जवाबदेही लेने से इनकार करने के कारण संक्रमण और भूखमरी के दोहरे खतरे का समाना कर रहा है। ऐसे समय में जनता की भोतिक स्थितियों की पूर्ण अवहेलना के खिलाफ एक लोकप्रिय जनाक्रोश फूट सकता है। भाजपा नीति केन्द्र एवं राज्य सरकारें और मुख्यधारा की मीडिया जैसे उनके प्यादों ने इस आक्रोश को मुस्लिम समुदाय के खिलाफ मोड़ने की पूरजोर कोशिश की है। कोविड-19 और उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा के सम्बन्ध में दिल्ली एवं पूरे देश मे इसी तरह की कथा कही जा रही है। यह एक ऐसा अख्यान है, जिसकी तमाम जनवादी और प्रगतिशील ताकतों द्वारा अवश्य ही निन्दा और मुकाबला की जानी चाहिए। अन्त में यह नोट किया जाना चाहिए कि कार्यकर्त्ताओं को दागी बनाना और लक्षित करना उन्हें निरूत्साहित करने और आन्दोलन को दबाने की एक कार्यनीति है, जिसका प्रयोग राज्य द्वारा तेजी से एवं तीव्रता के साथ किया जा रहा है। एल्गार परिषद भीमा कोरेगांव मामले ंमें 11 शिक्षाविदों, वकीलों, पत्रकारों एंव कवियों की गिरफ्तारी हो या अखिल गोगोई, चिंगीज खान, इशरत जहां, डॉ. कफिल खान, खालिद सैफी, सरजील इमाम और कई अन्य की जेल बन्दी यह दर्शाता है कि राज्य किसी प्रकार की असहमति या विरोध के प्रति ज्यादा से ज्यादा असहिष्णु बनता जा रहा है। ऐसे समय में यह इसकी जरूरत है कि जनवादी एवं प्रगतिशील ताकतें अपनी आवाजें बुलन्द करें, नहीं तो सदा के लिए शांत कर दिये जाने का खतरा बढ़ेगा। 

राजकीय दमन विरोधी अभियान (सीएसएसआर) जनवादी एवं प्रगतिशील संगठनों और व्यक्तियों से आग्रह करता है कि वे कार्यकत्ताओं, पत्रकारों एवं छात्रों पर लगाये गए इन आरोपों की निन्दा करें और उनकी रिहाई और साथ ही दुर्भावनापूर्ण खोज को बन्द करने की मांग करें:

1. कठोर कानून यूएपीए के तहत दिल्ली एवं कश्मीर में कार्यकर्त्ताओं और पत्रकारों की दुर्भावनापूर्ण खोज तत्काल बन्द की जाये। 
2. खासकर कोविड-19 महामारी को देखते हुए मनगढन्त मुकदमों में सभी गिरफ्तार राजनीतिक बन्दियों और कार्यकर्त्ताओं को तत्काल रिहा किया जाये। 
3.  सीएए विरोधी आन्दोलन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की आड़ में, खासकर उत्तरी-पूर्वी दिल्ली हुई हिसां के मद्देनजर सभी दोषी व्यक्तियों के खिलाफ (कोविड-19 की सीमाओं के साथ) तात्काल कार्रवाई की जाये। 
4. यूएपीए, एनएसए, पीएसए और दूसरे सभी कठोर कानूनों को रद्द किया जाये। 

*कम्पेन अगेंस्ट स्टेट रिप्रेशन*

(आयोजक टीम : एआईएसएस, एमआईएसएफ, एपीसीआर, बीसीएम, भीम आर्मी, बिगुल मजदूर दस्ता, बीएससीईएम, सीइएम, सीआरपीपी, सीसीएफ, दिशा, डीआईएसएससी, डीएसयू, आईएपीएल, आईएमके, कर्नाटक जन शक्ति, केवाईएस, लोकपक्ष, एलएसआई, मजदूर अधिकार संगठन, मजदूर पत्रिका, मोर्चा पत्रिका, एनएपीएम, एनबीएस,, एनसीएचआरओ, नवरूज, एनटीयूआई, पीपल्स वाच, रिहाई मंच, समाजवादी जन परिषद, सत्यशेधक संघ, एसएफआई,, यूनाइटेड अंगेस्ट हेट, डब्ल्यूएसएस)

Thursday, April 23, 2020

Vietnam has reported 0 COVID-19 related deaths with only around 268 cases after 90+ days



Vietnam has reported 0 COVID-19 related deaths with only around 268 cases after 90+ days since the first outbreak in January.

A country with over 96 million people, that borders on China, has managed to contain the pandemic better than most similarly sized countries with larger economies.

How has the Socialist Republic of Vietnam been so successful in fighting the coronavirus?

- Early on the government made firm decisions to prioritise and preserve the health of its people even if it would come at the cost of the economy.

- The government called for a national emergency after only the 6th case was reported and was fast in implementing social distancing, forced quarantines as well as targeted testing and tracing, with almost 185,000 free tests done so far.

- Information campaigns were started to inform the public about the pandemic, so there was clarity on what people could expect and had to do, including the wearing of face masks.

- Medical students, retired doctors and nurses were mobilized to join the fight on the frontlines.

- There is close cooperation between state institutions, ministries, social movements and political organizations like the Ho Chi Minh Communist Youth Union, with the prime-minister calling the fight against the coronavirus the "spring offensive of 2020" referring to the military offensive that defeated U.S. imperialism in 1975.

- To minimize workers and their families being affected by the lockdown, the government approved a 111.55 million dollar financial support package that includes covering all costs for workers in quarantine or who are recovering from the disease.

- To maintain food security, the government provided essential goods to neighborhoods in lockdown, installed free rice dispensing ATMs and put a halt to rice exports to other countries.

- On top of that it has donated 550,000 masks to Europe, sent 450,000 protective suits to the U.S., donated protective clothing, medical masks, testing equipment and kits to Cambodia and Laos and testing kits to Indonesia, to show its "spirit of mutual support to partner countries."

The World Health Organization and World Economic Forum have both praised Vietnam for its comprehensive, low-cost model of disease prevention.

While the pandemic showed some rich countries acting selfishly, Vietnam demonstrated there is another cure for the pandemic: solidarity.

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3520232537992942&id=555876691095223


Wednesday, April 22, 2020

शुभम की कविता "किसान"

                               
 कोरोना महामारी के कारण हुए लॉक-डाउन में छात्र-मशाल का (अप्रैल-मई )अंक ऑनलाइन                                             उपलब्ध है।

                            कविताएँ-2



                                 किसान 
                                 सृष्टि का 
                                 सर्वश्रेष्ठ कवि है

                                 उसने गेहूँ की बालियों में
                                 सोने की कल्पना की

                                 लेकिन वो सोना इतने 
                                 सस्ते दाम पर बिका 

                                 कि उसने 
                                 अपनी कविता की
                                 पाण्डुलिपियों को 
                                 गोबर के घूरे में
                                 सड़कर खाद 
                                 बन जाने दिया

                                 और लिखता रहा 
                                 दूसरों का पेट भरने वाली
                                 मौसमी कविताएँ
                                 अन्य फसलों के साथ….

                                 दिनांक - 22/04/2020

                                  -: शुभम कहता है...
                                        (छात्र,काशी हिंदू विश्विद्यालय)
     

Tuesday, April 21, 2020

The Problem of Rape and Rape Culture


कोरोना महामारी के कारण हुए लॉक-डाउन में छात्र-मशाल का (अप्रैल-मई )अंक ऑनलाइन उपलब्ध है।

                        लेख संख्या-02



It is not an unknown fact that in India women are regarded as 'second class citizens', who are either  'weak and meek' or 'always asking for it'. They  are considered to be worthy of nothing but sexual control and violence, submission and an undignified life. All of these problematic yet prevalent ideas have existed in the society for the longest of time. They remain largely unchecked as well.


Ideas and norms like these are a part of a larger problem called 'The Rape Culture'. There is a misconception in people regarding this term. Many think that rape is not a part of 'culture'. Culture refers to the ideas, belifes, norms, customs, and social behaviour of a particular people or society thefore, even crimes, social evils, misogyny, patriarchy etc are a part of culture. Rape Culture refers to the social environment in which rape and predatory behaviour are existent and normalized due to regressive societal belifes and norms constructed around gender and sexuality.

Behaviours, attitudes, ideas that account for rape culture can vary from being  as seemingly harmless as sexist jokes to being as apparently harmful as sexual violence and assault, and everything in between. As much as we hate to admit it, our day to day activities, behaviours, ideas, conversations are full of instances that normalise rape. For example, sexual objectification of women, cat calling, slut shaming, blaming the victim for the sexual assault, trivializing rape through rape jokes, usage of gendered profanity  to verbally cause a 'sexual attack' on the female members of one's family, attaching women's 'chastity' to the honour of the family, ostracization of surviours of sexual assaults etc. Acceptance of less severe pro-rape attitude normalises more severe ones and it continues to result in rape of numerous people.

Patriarchy leads to misogyny and sexism and normalization of various aspects of these two, leads to rape culture. But who perpetrates the rape culture? An individual? Families? Or a community? Or only certain communities? Does the media do it? Does the state do it as well? The answer is that all of us are responsible for it. Most individuals, families, neighbourhoods, institutions and even huge entities like a state and its machinery can be perpetrators of the rape culture. 

We don't have to look far from our own houses for examples. Groups of people cracking rape jokes, marital rapes happening in almost every household where consent after marriage isn't even seen as a requirement are classic examples of how the society is a breeding ground for rape culture. Girls being told to cover themselves up around men since exposed skin is provocative and 'invites' men is an example of subtle form of victim blaming. Cinema in India has often   sexually objectified the bodies of women using item songs and vulgar lyrics, disregarding their consent and portraying them as objects for sexual gratification. Heroines are often shown driven towards the abusive hero who disrupts her privacy, doesn't take her consent, forces her into physical intimacy, disregards her sexuality. An example of it is the recent movie called Kabir Singh. Movies like these send a wrong message in the audience and normalizes these acts. Sadly, even the state, which we think has institutions to safe guard women against such sexual violence, is a part of the whole problematic system. From protecting the powerful sections against charges of rape, electing alleged rapists to the Parliament who make laws for women to an insensitive police system infested by rape culture in itself and  slow, incompetent judiciary, all of them are a part of the problem.

Being a part of the problem doesn't necessarily mean that one is going to become a rapist, but it surely means that one can be a potential rapist or feed the mind of a potential rapist, i.e. contributing to the problem. 

The Rape Culture is detrimental for both women and men. It robs women of their freedom, their right to live a dignified and safe life, free from fear, guilt, anger and in worst cases depression and self harm. It also blurs her understanding of what is sexual harrsesment and what is not. Many women do not consider behaviors like stalking and eve teasing as problematic or a 'big deal' due to the normalization of such actions. In the case of men, the rape culture trivializes and ignores the rape of men totally. It also gives rise to toxic, aggressive and predatory  behaviours in a lot of men. Therefore, the problem of rape culture needs an effective and long term solution.

According to the latest government figures, Indian police registered 33,658 cases of rape in 2017. Experts say that a woman is raped in India every 16 minutes. According to the National Crime Records Bureau data from 2017, 93% of all rapes in India are perpetrated by people known to the victim Rape is a non-bailable offense in the Indian penal code. But people do get bail because of a lack of evidence (in many cases). The accused are often sheltered by police, or politicians, or even lawyers. The rape problem in India is not just a legal issue, as one cannot ignore its social aspect.




We have a patriarchal society in India, which gives more importance to men. Children internalize this at a very young age. A girl's wishes and her opinions are not considered as important as that of a boy's. The female child learns to be subservient from the beginning.

Repeated rape cases have angered many Indians. Some are now demanding capital punishment for rapists. And there have also been calls for authorities to publicly hang the culprits. This shows a rise in violent tendencies in the country.

On December 6, the police shot all four accused of the Hyderabad rape case in an alleged extra-judicial killing. Many Indians lauded the police officers for dispensing "justice." Videos on social media showed women in Hyderabad city sharing sweets and celebrating the killings. Low conviction rate and the flaws in the country's judicial system are giving way to vigilante justice.

Although the government has doubled prison terms for rapists to 20 years, civil society activists continue to demand a quicker implementation of the laws.

It is often believed that strict laws can bring about change. But what is a strict law? Law needs to be effective and the investigating agency and prosecution more proficient and efficient. The government must set up a special unit that recruits and trains officers specifically to deal with sexual offences, and create easy access to doctors, forensic experts, rape survivors and psychologists. This will help victims feel confident in coming forward to seek justice. All registered offences must be dealt with by this unit within a month using fast-track courts.  India’s police force, heavily overworked, mostly desensitised and routinely pulled in different directions, can no longer be counted on to devote the time and dedication needed to deal with this deep and wide social issue. Predators must know that justice is swift and favourable to victims. India’s approach to curbing sexual aggression must steer clear of diminishing women, and root out reckless patriarchal attitudes instead.

Recently Telangana chief minister K Chandrashekar Rao told transport workers to keep women workers away from night-shift roles —reinforcing that the onus on staying safe is on women. This is a misguided approach. It is men who should be held accountable for a problem that has everything to do with them, and nothing to do with women. That problem is a culture of misogyny, aggressiveness and normalised sexual abuse towards women. To even begin an attempt to alter this, we need a robust conversation around men, which has to begin in schools, public fora and highest offices. Boys have to be taught that it’s wrong to talk disparagingly about women, feel up girls surreptitiously, make lewd remarks and leer at them. This cannot be left to parents alone. It should be a part of the school curriculum from primary school onwards, where attitudes are shaped. For older students, gender sensitisation classes and tests should be mandatory. Violence against women is so deeply rooted in India, that this sensitisation should be prioritised as much as basic reading and writing skills. Girls must be encouraged to be strong, vocal and intolerant of transgressions, however small.

Workplaces must crack down on men who make sexualised jokes. We should stop taking sexually offensive banter lightly, because it leads to a desensitisation, which starts casually and eventually normalises sexual violence.

Most importantly, public office bearers and role models need to stop blaming women for their choice of dress or work hours, because that does nothing to make India safer for women. Moreover movies that are a product of patriarchy and misogyny or promote gender based discrimination should not be made hit. And songs that objectify women should not be made our party anthems! Sharing a good article on gender sensitivity or discussing about it with friends and family while having dinner is an easy but effective step.

Thus we believe that men and boys are not naturally violent; patriarchal norms make them insensitive. Therefore, not every man is a part of the problem, but every man can be a part of the solution.


Radhika & Anshul
(Pursuing PG, Banaras Hindu University)

Sunday, April 19, 2020

सुमित की कविता 'विद्रोही मजदूर' को पढ़िए।

हम जा जरूर रहे हैं
पर लौट के भी आएंगे!!
हर बार की तरह
 टुकड़ों में नहीं एक साथ आएंगे।
पर तुम्हारी गुलामी 
के लिए नहीं आएंगे।।
हम आएंगे अपने 
अधिकार के लिए।
अपने आने  वाली पीढ़ियों
 के लिए आएंगे।
और हां..
तुम्हारी दया की भीख नहीं मांगेंगे..
तुम्हारा दिल पसीजने का 
इंतजार नहीं करेंगे।
क्यूंकि वो पत्थर का है..
और पत्थर तो चोट मांगता है।
तो इस बार हम हम मांगने नहीं..
छीनने आएंगे।
गिड़गिड़ाने नहीं ..
लड़ने आएंगे।
और तुम्हें एहसास करा देंगे..
अपनी ताकत का।
हम आएंगे,
अपने लहू और पसीने का 
हिसाब मांगने आएंगे।
अपने बच्चो को कलम थमाने के लिए..
अब हम विद्रोह का झंडा उठायेंगे।
और जब हम आएंगे तब
मजबूर मजदूर नहीं..
विद्रोही मजदूर कहलाएंगे।

         - सुमित ( छात्र,बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी)

आनंद तेलतुंबड़े व गौतम नवलखा की गिरफ्तारी एक लोकतांत्रिक देश के लिए शर्मसार करने वाली घटना!

कोरोना महामारी के कारण हुए लॉक-डाउन में छात्र-मशाल का (अप्रैल-मई )अंक ऑनलाइन उपलब्ध है।

लेख संख्या - 1




भारत के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबड़े ने 14 अप्रैल मंगलवार दोपहर को एनआईए के सामने सरेंडर कर दिया था लेकिन अभी उनकी कस्टडी 25 अप्रैल तक बढ़ा दी गई है। वही गौतम नवलखा की कस्टडी जारी है।

आज में समय में एक तरफ जहां देश के 50 फ़ीसदी सांसदों पर गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं वही देश के पढ़ने-पढ़ाने वाले छात्र-बुद्धिजीवियों और प्रोफेसरों को जेल में डाला जा रहा है।

जाहिर है देश की वर्तमान सरकार को किसी भी अपराधी से कोई खतरा या परेशानी नहीं है। लेकिन पढ़े लिखे बुद्धिजीवी जो सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करते हैं व सरकार की जनविरोधी नीतियों की का पर्दाफाश करते हैं,उनसे सरकार को भारी खतरा और डर लगता है। देश और समाज को गति देने वाले ऐसे बुद्धिजीवियों को सरकार जेलो में डाल रही है। क्योंकि एक फासीवादी सरकार जनता को अशिक्षित रख कर ही शासन कर सकती है। लेकिन अगर जनता शिक्षित हो जाय तो ऐसे फासीवादी सरकार को अपने जनविरोधी नीतियों को लागू करने में विरोध का सामान करना पड़ता है। जाहिर है सरकार डरती है कि देश में इस लूट और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ के खिलाफ कोई जन आंदोलन न खड़ा हो जाय। इसलिए वो चुन-चुन कर ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर रही है, जो जनता को शिक्षित, जागरूक व संगठित करने का काम करते हैं।

भीमा कोरेगांव हिंसा के नाम पर इसी तरह कई मानवाधिकार से लेकर सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को फ़र्ज़ी तरीके गिरफ्तार किया जा चुका है ।जिनमें सुधा भारद्वाज,सुधीर धवले,सोमा सेन,सुरेंद्र गडलिंग,वर वरा राव,महेश राउत(TISS),वर्नन गोंजालवेस,रोना विल्सन आदि हैं। इसमे सबसे बड़ी बिडम्बना यह है कि भीमाकोरे गाँव हिंसा दलितों के ऊपर हुई थी। जिसे हिंदूवादी संगठनों ने दलितों के ऊपर किया था । इस हिंसा को हवा देने के पीछे सम्भाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे है जिनके ऊपर कई FIR दर्ज है लेकिन काफ़ी दवाब के बाद इनको गिरफ्तार तो किया गया लेकिन फिर जल्द ही रिहा भी कर दिया गया। ज्ञात हो की इन दोनों को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना गुरु बात चुके हैं।आज जो जेलों में बंद है,सिर्फ सुधीर धवले को छोड़कर उनका न तो प्रत्यक्ष तौर पर न ही अप्रत्यक्ष तौर पर इस कार्यक्रम से लेना देना था। लेकिन इस फासीवादी सरकार ने देश की जनता के बीच इनकी गिरफ्तारी को जायज ठहराने के लिए इनका माओवादी से संबंध बताया। इतने भी बात न बनी तो जबरन एक कथित चिट्ठी का स्वांग रचा गया जिसमें यह दिखाया गया की ये सभी देश के प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रच रहे थे। ताकि सिर्फ भावनाओं के आधार पर देश की जनता से मौन सहमति ले ली जाए। सोचने वाली बात है कि गिरफ्तारी हुई भीमा कोरे गाँव हिंसा का बहाना बनाकर,सरकार जब सबूत नहीं दिखा पाई तो माओवादी और फिर फ़र्ज़ी चिट्टी से तार जोड़ दिया गया। यह एक साधारण इंसान भी समझ सकता है कि ये सारे जनता के बुद्धिजीवी और कार्यकर्ताओ को इसलिए जेलों में रख कर उत्पीड़ित किया जा रहा क्योंकि इनके विचार सत्ता और सरकार से नहीं मिलते हैं। एक लोकतांत्रिक देश में सत्ता से भिन्न या विपरीत विचार रखना जुर्म है। तो फिर हमें देश की लोकतांत्रिक मशीनरियों पर सवाल उठाना लाज़िम है। देश के सुप्रीम कोर्ट को भी ये सभी इतने बड़े अपराधी लगते हैं कि इनको जमानत तक नहीं दिया जा रहा है। जबकि बड़े बड़े अपराधी जमानत पर बाहर है चुनाव लड़ रहे हैं और संसद की कुर्सियों पर बैठ कर देश के लिए कानून बना रहे है। आज इनके केस को राज्य सरकार के लेकर NIA(नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी) को दे दिया गया है।ताकि राज्य सरकार द्वारा इन्हें रिहा न किया जा सके। केंद्र की बीजेपी सरकार द्वारा यह कृत सीधा-सीधा बदले की करवाई नजर आता है। जो पूरे देश के किये शर्म का विषय है।

आज देश में कोरोना का संकट छाया हुआ है। जिससे पूरा देश लॉकडाउन झेल रहा है।जिसमें खास कर मजदूरों की हालात बहुत ही दयनीय है। देश की एक बड़ी आबादी कोरोना से ज्यादा भुखमरी की चपेट में है। ऐसे में सुरक्षा की दृष्टि से कई जेलों से कैदियों को बाहर निकाला जा रहा है ताकि संक्रमण को रोका जाय। वैसे में आनंद तेलतुंबड़े और गौतम नौलखा जैसे बुद्धिजीवियों और लेखकों को जेल में क्यों डाला जा रहा है ये कोई भी इंसाफ पसंद भली-भांति समझ सकता है। आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है सरकार की जिसके चलते वो इन दोनों को जेल से बाहर देखना रास न आरहा है।

आनंद तेलतुंबड़े एक ऐसा नाम जिन्होंने वर्तमान में सबसे ज्यादा चर्चा में रहे डॉ अम्बेडकर के ऊपर कई किताबों को लिखा और संपादन किया है। जिसमे वो अम्बेडकर के रैडिकल विचारों को सामने ला रहे थे। दूसरी तरह आरएसएस अम्बेडकर को साम्प्रदयिक रंग में रंग कर उनका भगवाकरण करना चाहती है। लेकिन आनंद की किताब और लेख आरएसएस के लिए चुनौती बनकर खड़ी हो रही थी। चूंकि अम्बेडकर ने जीवन भर हिन्दू धर्म (जाति-व्यवस्था,धर्म ग्रंथ)का विरोध किया जिसका वाहक आज आरएसएस है । चूँकि आरएसएस के पास वैचारिक धरातल पर तथ्यों के साथ आंनद की लेखनी से संघर्ष करने का कोई तार्किक आधार न है। इसलिए वो सत्ता में बैठी बीजेपी में सरकार जिसका लगभग सारी सरकारी संस्थाओं पर कब्ज़ा हो चुका उसका इस्तेमाल करके उनके मनोबल को तोड़ना चाहती है।

ऐसा नहीं है की इस तरह की गिरफ्तारी सिर्फ कुछ लोगों की ही हुई बल्कि देश के अलग अलग हिस्से से सैकड़ो राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं को इसी तरह जबरन गिरफ्तार किया जा चुका है। CAA-NRC-NPR विरोधी आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नेतृत्वकारी लोगों को खास करके इस लॉकडाउन में टारगेट किया जा रहा है। सरकार के लिए एक तरफ तो कोरोना से निपटने की चुनौती है लेकिन दूसरी तरफ वो इस लॉकडाउन को एक बेहतर अवसर के रूप उपयोग कर रही है और अपने राजनैतिक और वैचारिक प्रतिद्वंदियों को जेल भेज कर बदला ले रही है। जो एक लोकतांत्रिक देश के लिए बहुत ही निंदनीय हैं । ऐसे समय में देश की मेहनतकश जनता ही विकल्प है जो अपने बुद्धिजीवियों की रक्षा के लिए आवाज उठाये।


गौरतलब है कि तेलतुंबड़े और नवलखा ने अपने ख़िलाफ़ एफ़आईआर रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इनकार के बाद उन्होंने अग्रिम ज़मानत के लिए याचिका दायर की थी. ये याचिका भी बीते सप्ताह रद्द हो गई थी.


कौन हैं आनंद तेलतुंबड़े?

आनंद तेलतुंबड़े गोवा के एक मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में पढ़ाते हैं. वो एक चर्चित बुद्धिजीवी और दलित अधिकार कार्यकर्ता हैं.कई नौकरियां करने के बाद उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद से पढ़ाई की. वो भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन के एक्ज़ीक्यूटिव प्रेसिडेंट और पेट्रोनेट इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर रह चुके हैं.वो आईआईटी खड़गपुर में पढ़ा चुके हैं और मौजूदा वक़्त में गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेज़मेंट में पढ़ा रहे हैं.अब तक 26 किताबें लिख चुके तेलतुंबड़े कई अख़बारों में कॉलम भी लिखते हैं. वो कई शोध पत्र भी लिख चुके हैं.वो सीपीडीआर (लोकतांत्रिक अधिकार रक्षा समिति) के महासचिव भी हैं.


गौतम नवलखा कौन हैं?

गौतम नवलखा एक मशहूर ऐक्टिविस्ट हैं, जिन्होंने नागरिक अधिकार, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकार के मुद्दों पर काम किया है.वे अंग्रेज़ी पत्रिका इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) में सलाहकार संपादक के पद पर भी रहे हैं. नवलखा लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था पीपल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) से भी जुड़े रहे हैं.
पीयूडीआर से लगभग चार दशकों से जुड़े रहे नवलखा ने मज़दूरों, दलितों आदिवासियों और सांप्रदायिक हिंसा जैसे मुद्दों पर काम किया है।


-अनुपम कुमार
(शोध छात्र, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी)