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Sunday, July 19, 2020

भारतीय न्यायपालिका का पितृसत्तात्मक व महिला-विरोधी चेहरा!


-आकांक्षा आज़ाद

               भारतीय समाज मूलतः एक सामंती समाज है जिसकी एक मजबूत नींव पितृसत्ता है। पितृसत्ता अर्थात पिता की सत्ता वाला समाज, जहां पिता ही घर का मुखिया हो। हमारे परिवार से लेकर राज्य भी इसी नींव पर टिका है। कानून बनाने वाली विधायिका (संसद और विधानसभा) और कानून लागू करने वाली कार्यपालिका (सरकार) के पितृसत्तात्मक चरित्र से तो फिर भी लोग रूबरू है लेकिन विशेष बात तब आती है जब न्याय दिलाकर संविधान और नागरिकों (विशेष तौर पे महिलाओं) के अधिकार की रक्षा की जिम्मेदारी वाली संस्था में भी पितृसत्ता की जड़ें गहरी हो। सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अदालतों के बारे में सामान्यजन में यही धारणा है कि यह स्वतंत्रत, निरपेक्ष, और कभी गलत गलत न होने वाली संस्था है। हाल ही में कर्नाटक हाई कोर्ट और गुवाहाटी हाई कोर्ट ने जो फैसले सुनाए है उसने कोर्ट के प्रति इस धारणा एक धक्का जरूर दिया है।
                    एक नज़र अपने समाज पर डाले तो हम पाते हैं कि महिला और पुरुष दोनों को ही समाज अलग-अलग ढांचे में रखना चाहता है। समाज में 'आदर्श भारतीय महिला' के कई 'गुण' माने गए हैं जैसे एक 'आदर्श भारतीय महिला' को एक अच्छी गृहणी होना चाहिए, पति को स्वामी मानकर दिन रात उसकी सेवा करनी चाहिए, पति अगर मारपीट भी करे तो चुपचाप सहते रहना चाहिए आदि आदि। इन्ही 'गुणों' में कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक और 'गुण' जोड़ा है। कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस कृष्णा एस. दीक्षित ने बताया है कि बलात्कार के बाद आदर्श भारतीय महिला को कैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। 

शादी का झांसा देकर बलात्कार के एक मामले में चीफ जस्टिस आरोपी को बेल देते हुए महिला पर टिप्पणी की और कहा कि- 'महिला का कहना है कि वह अपराध के बाद थकी हुई थी और सो गई थी, एक भारतीय महिला के लिए अशोभनीय है, हमारी महिलाएं बलात्कार के बाद ऐसे व्यवहार नहीं करती हैं।' 

चीफ जस्टिस दीक्षित उसी बीमार मानसिकता के शिकार है जहां लड़कियों के देर रात तक बाहर आने-जाने और शराब पीने से 'स्त्रीधर्म' भ्रष्ट हो जाता है। इसलिए शिकायतकर्ता महिला को ही उन्होंने भरोसे लायक नहीं माना। उनका कहना है कि 'शिकायतकर्ता ने यह नहीं बताया कि वो रात 11 बजे उनके (आरोपी) के दफ़्तर क्यों गई थीं। उन्होंने आरोपी के साथ अल्कोहल लेने से भी एतराज नहीं जताया और  सुबह तक उन्हें अपने साथ रहने दिया।' 'उन्होंने यह भी नहीं बताया की उन्होंने शुरुआत से ही अदालत से सम्पर्क क्यों नहीं किया जब आरोपी ने कथित तौर पर उनपर यौन संबंध के लिए दबाव बनाया था।' भारत में छेड़खानी से लेकर सामूहिक बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों की संख्या लाखों में है। हर घण्टे न जाने कितनी महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे। इनमें से कुछ मामले दर्ज होते हैं और कोर्ट तक पहुँचते है। ज्यादातर दर्ज होकर भी पुलिस स्टेशन के फाइलों में धूल फांकते है। भारत में इन आरोपियों को सजा मिलने की दर सिर्फ 18% है जिसका मतलब है कि 100 में से 72 आरोपियों को कभी उनके अपराध की सज़ा नहीं मिलती। जिस तरह के सवाल चीफ जस्टिस दीक्षित ने शिकायतकर्ता से की क्या बिल्कुल उसी तरह के सवाल एक बलात्कार की सर्वाइवर से उसका घर, परिवार, समाज नहीं पूछता?

'इतनी देर रात अकेली क्यों बाहर गई थी?', 'ये कैसे कपड़े पहन रखें है तुमने? ऐसे कपड़ो के कारण ही ब्लात्कार होते हैं।', 'ताली एक हाथ से नहीं बजती जरूर तुमने ही शह दी होगी।', 'तुम्हे देखकर तो नहीं लगता कि तुम्हारे साथ रेप हुआ है। तुम खुश कैसे रह सकती हो?' और अगर रेप हुआ तो भी तुम पहले क्यों नहीं बताया?...आदि आदि। और इन्ही सब सवालों के माध्यम से जिस तरह से सर्वाइर को ही दोषी ठहराया जाता है उसी का नतीजा है कि लड़कियां और महिलाएं इन सब गम्भीर मामलों पर चुप्पी साध लेती हैं। 

दूसरा मामला गुवाहाटी हाई कोर्ट का है। जहाँ 21वीं सदी में भी चीफ जस्टिस अजय लाम्बा और न्यायाधीश सौमित्रा सैकिया का कहना है कि 'अगर एक महिला हिन्दू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी करती है और सिंदूर और शाखा (शंख से बनी चूड़ियां) पहनने से मना करती है तो इसका मतलब है कि वह महिला इस शादी को अस्वीकार कर रही'। इस तरह के महिला विरोधी बयान देकर कोर्ट महिलाओं की स्वतंत्रता खुद ही छीन रही। ऐसी हज़ारों हिन्दू महिलाएं है जो शादी को मानते हुए भी सिंदूर और शाखा पहनना नहीं पसन्द करती हैं। क्या कोर्ट के बयान के अनुसार यह सभी महिलाएं अपनी शादियों को अस्वीकार कर रहीं? 

https://www.google.com/amp/s/www.prabhatkhabar.com/amp/story/national%252Fgauhati-high-court-says-refusal-to-wear-sakha-sindoor-signals-womans-unwillingness-to-accept-marriage

दरअसल जिस तरह का सामंती हमारा समाज है कोर्ट की महिला विरोधी अभिव्यक्ति उसी समाज का प्रतिबिंब है। कभी यह खुले रूप में सामने आता है कभी छुपे रूप में। हमारा समाज खासतौर पर महिलाओं को उनके 'आदर्श भारतीय महिला' वाले रूप से अलग देखना नहीं चाहता है। यह तमाम कोर्ट- कचहरी, सरकारें, परिवार जैसी संस्थाएं इसी 'आदर्श रूप' को बनाये रखने के लिए ही हैं। 
               यह ऐसा पहली बार नहीं है जब हमारी न्यायव्यवस्था ने महिला विरोधी फैसले दिए हो या महिला द्वेषी टीप्पणी की हो। अगर ठीक से देखे तो इस तरह के फैसलों के अंबार लगा है। अक्टूबर 2016 में भी स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए की शिकायतकर्ता महिला का व्यवहार इस तरह का नहीं था जैसा ब्लात्कार के दौरान होना चाहिए, कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया था।
यह सोचना अंदर तक हिला कर रख देता है कि किस तरह यह व्यवस्था महिलाओं के प्रति इतना कठोर और असंवेदनशील हो सकता है कि वह इनसब पर भी नियंत्रण रखना चाहता है कि ब्लात्कार के दौरान या उसके उसके बाद महिलाएं किस तरह से व्यवहार करें। इस तरह के ट्रॉमा के दौरान किस व्यक्ति का शरीर और दिमाग किस तरह से रिएक्ट करेगा इसपे भी समाज ने मानक गढ़ कर रखें है। क्या इस तरह के न्यायालयों से औरतें कभी न्याय की उम्मीद लगा सकती हैं? 
इस न्याय व्यवस्था में कभी जाति के कारण, कभी हैसियत के कारण तो कभी सिर्फ महिला होने के कारण हज़ारो-लाखों महिलाएं न्याय से वंचित रह जाती है। सन 1992 के सितम्बर के भंवरी देवी केस (राजस्थान) को याद करें तो इस केस ने सरकार और कोर्ट के मिलीभगत के साथ-साथ यह भी बताया कि जब भारतीय समाज की दूसरी सबसे मजबूत नींव जाति व्यवस्था और पितृसत्ता का मेल होता है तो उसका रूप कैसा होता है। भंवरी देवी नाम की एक दलित महिला ने गांव के गुज्जर परिवार में  हो रहे बाल विवाह होने से रोका तो गुज्जर जाति के पांच लोगों लोगों ने भवंरी देवी को उसकी 'औकात' बताने के लिए सामूहिक बलात्कार किया। पुलिस से लेकर तत्कालीन सरकार के बड़े बड़े नेताओं ने मामले को दबाने की भरपूर कोशिश की। मामला जब निचली अदालत में गया तब अदालत ने सभी आरोपियों को बरी करते हुए फैसला दिया कि:-
* गांव का प्रधान कभी ब्लात्कार नहीं कर सकता।
*60 साल का बुजुर्ग व्यक्ति कभी भी किसी का ब्लात्कार नहीं कर सकता।
*आरोपियों में चाचा भतीजा भी शामिल हैं। कोई भी व्यक्ति अपने रिश्तेदार के सामने किसी महिला का ब्लात्कार नहीं कर सकता।
* ऊंची जातियों के लोग अशुद्ध नीची जाति की महिला का बलात्कार नहीं कर सकता क्योंकि इससे सभी अशुद्ध हो जाएंगे।
* कोई पति अपने पत्नी का बलात्कार होते नहीं देख सकता।
अभी मामला हाई कोर्ट में है जिसमें आजतक मात्र एक सुनवाई हुई है और इसी तरह दो दशक से भंवरी देवी न्याय का इंतज़ार कर रही है। अदालत के इस फैसले में किस हद का महिला द्वेष भरा पड़ा है ये देख पाना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है, विशेषतौर पे नीच जातियों के महिलाओं के प्रति। इसी फैसले के साथ इस अदालत ने इन सभी बलात्कारों को झूठा ठहरा दिया जो ऊंची जाति के लोगों ने नीची जाति के लोगों को उनकी औकात बताने के लिए की थीं।

https://www.google.com/amp/s/hindi.asianetnews.com/amp/national-news/27-years-of-bhanwari-devi-case-victim-waiting-for-justice-q254ya

             एक अन्य पहलू पे बात करें तो जिन न्यायाधीशों पर न्याय देने के जिम्मेदारी है उनमें कई न्यायाधीशों पर खुद ही महिलाओं के यौन शोषण का आरोप है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर उनकी एक पूर्व महिला कर्मचारी ने उनपर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इस मामले को देखने के लिए तीन सदस्यीय कमिटी भी बनी जिन्होंने मुख्य न्यायाधीश को बेगुनाह पाया और सभी आरोपों को निराधार बता दिया। गौरतलब है इस कमिटी पर सही न्यायिक प्रकिया नहीं अपनाने के आरोप भी लगे थे। जब स्वंय मुख्य न्यायाधीश पर इस तरह के गम्भीर आरोप लग रहे तो इस न्याय व्यवस्था की सच्चाई उघड़ के सामने आ जाती है। 

       कुल मिलाकर यह कहना कि इस तंत्र के बाकी संस्थाओं की तरह ही यह न्याय व्यवस्था खुद ही पितृसत्ता से लिपटी हुई है, यह कहना जरा भी अतिश्योक्ति नहीं होगी। कभी 'आदर्श भारतीय महिला' की विशेषता बताते हुए तो कभी औरतों की सिंदूर लगाना या न लगाने की छोटी सी चॉइस को ही शादी की प्रमाण घोषित करते हुए कोर्ट की असलियत को ढकने वाला मुखौटा नीचे सरक ही जाता है और उनका भद्दा महिला विरोधी चरित्र दिखने ही लगता है।

Friday, July 17, 2020

कब डरता है दुश्मन कवि से?




मिल मजदूर, कवि और राजनीतिक सक्रियतावादी दक्षिण अफ्रीकी बेंजामिन मोलायस को पुलिस की हत्या के आरोप में दक्षिण अफ्रीका के छठे राष्ट्रपति अंतर्राष्ट्रीय साम्यवाद के मुखर विरोधी पी डब्ल्यू बोथा की सरकार ने 18 अक्टूबर 1985 की सुबह प्रीटोरिया सेंट्रल जेल में फांसी दे दी। उस समय सोवियत संघ, यूरोपीय समुदाय, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और कॉमनवेल्थ के 49 राष्ट्रों ने बेंजामिन मोलायस को जीवन दान देने की अपील की जिसे वहां की सरकार ने अनसुनी की। इस फांसी का विरोध अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुआ। दक्षिण अफ्रीका में सड़कों पर लड़ाई हुई। ‘पहल’ पत्रिका का जनवरी 1986 का अंक बेंजामिन मोलायस को समर्पित था। फांसी दिए जाने के मात्र 5 दिन बाद 23 अक्टूबर 1985 को तेलुगु के महान क्रांतिकारी कवि वरवर राव ने बेंजामिन की याद में ‘कवि’ शीर्षक से कविता लिखी ‘कब डरता है दुश्मन कवि से/जब कवि के गीत अस्त्र बन जाते हैं/वह कैद कर लेता है कवि को/फांसी पर चढ़ाता है/फांसी के तख्ते के एक और होती है सरकार/दूसरी ओर अमरता/कवि जीता है अपने गीतों में/और गीत जीता है जनता के हृदय में’।
इस समय वरवर राव तेलुगू और भारत के ही नहीं विश्व के भी सबसे बड़े क्रांतिकारी कवि हैं। भारत का शायद ही कोई कवि होगा जिसने उनका नाम ना सुना हो। कवि, आलोचक, अनुवादक, पत्रकार और सबको सम्मोहित कर देने वाले वक्ता वरवर राव पर पिछले 45 वर्षों में सभी रंग की सरकारों ने उन पर झूठे मुकदमे दायर किए। उन्हें 8 वर्ष तक जेल में रहना पड़ा है। उनका जीवन एक साथ ‘साहस गाथा’ और ‘संघर्ष गाथा’ है। भारतीय कविता में ‘अभिव्यक्ति के खतरे’ सबसे अधिक वरवर राव ने ही उठाया है। उन्होंने कभी कविता को लेकर सरकार को गिरफ्तार करने को नहीं कहा पर सरकारों ने उन्हें गिरफ्तार किया और खतरनाक माना। छात्र जीवन में ही उन्होंने मद्रास जाकर प्रसिद्ध तेलुगु लेखक चलम और क्रांतिकारी कवि श्री श्री से भेंट की थी। उनके लिए श्री श्री की कविता ‘मां की तरह जन्म देने वाली है’। उन्होंने तेलुगु साहित्य में एम ए किया और केवल पीएचडी की उपाधि के लिए ‘लोक संस्कृति’ और ‘तेलंगाना मुक्तिसंग्राम’ पर शोध कार्य नहीं किया, बल्कि उन्होंने कई पौराणिक कथाओं का संपादन किया। 15 कविता संग्रह, आलोचना की कई किताबें है,ं पर वे केवल कवि लेखक नहीं है।ं क्रिस्टोफर काॅडवेल की तरह वे कला को ‘समाज का उत्पाद’ मानते हैं। संस्कृति उनके लिए उत्पादन में भागीदारी की अभिव्यक्ति है। जन उनके लिए कभी अमूर्त शब्द नहीं रहा है। जन आंदोलन उनकी दृष्टि में वर्ग संघर्ष के विभिन्न प्राकृतिक रूप हैं और लेखक इस संघर्ष का हिस्सा है। संघर्ष उनके लिए वर्गीय समाज में आवश्यक है। कवि उनके लिए ‘विश्व का प्रथम नागरिक’ ही नहीं, संसार का ‘गैर मान्यता प्राप्त विधि निर्माता’ भी है। 50 वर्ष से अधिक का उनका जीवन संघर्ष हमारे समय का सर्वोत्तम उदाहरण है। कला-साहित्य की उनकी दृष्टि वर्गीय है। उन्होंने लेखक द्वारा जन आंदोलन रचने की बात कही है। सरकार किसी भी दल की रही हो, वे गिरफ्तार किए जाते रहे हैं और जेल भेजे गए। सिकंदराबाद षड्यंत्र केस में उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाला गया। आपातकाल में ‘मीसा’ में ढाई वर्ष तक जेल में रहे। 30 मुकदमें दायर किए गए और सब में वे बरी किए गए। जेल में लिखी उनकी कविताओं के संग्रह ‘भविष्य चित्रपटम’ पर सरकार ने पाबंदी लगाई थी और आंध्र प्रदेश की तेदेपा की सरकार ने इन्हें नक्सलवादी नेताओं से शांति वार्ता में मध्यस्थ भी बनाया था। आंध्र प्रदेश में नक्सलवाद का लंबे समय तक प्रभाव था। नक्सलबाड़ी आंदोलन ने श्रीकाकुलम के आदिवासी किसानों में विद्रोह और संघर्ष पैदा किया था। 80 वर्ष के इस समर्पित, प्रतिबद्ध, मुक्तिकामी, परिवर्तनकामी क्रांतिकारी कवि का अग्नि-ताप कभी कम नहीं हुआ। वरवर राव का कोई उदाहरण नहीं है। 20 वर्ष की आजादी और संसदीय राजनीति के बाद नक्सलबाड़ी आंदोलन ने संसदीय राजनीति से एक सर्वथा अलग राह दिखाई थी जिसने भारतीय साहित्य और कविता के एक बड़े हिस्से में गुणात्मक परिवर्तन ला दिया। वरवर राव ने भारतीय समाज और राजनीति का बार-बार वास्तविक चेहरा दिखाया। अपने वक्तव्यों, भाषणों और रचनाओं में ‘जीवन सत्य’ को उन्होंने ‘निरंतर संघर्ष’ से जोड़ा। ‘कसाई का बयान’ कविता में एक कसाई असली कसाई से हमें परिचित कराता है। वरवर राव अग्नि में शब्दों को झोंक देने वाले कवि हैं। अपनी एक कविता में उन्होंने आजीवन संघर्षरत रहने की बात कही है और छात्र जीवन से अब तक सदैव संघर्षरत रहे हैं। ‘भूमंडलीकरण व एकरूपीकारण’ के साम्राज्यवादी प्रयासों का पिछले 30 वर्ष से उन्होंने डटकर विरोध किया है ‘मत हिचको/ओ शब्दों के जादूगर/जो जैसा है, वैसा कह दो/ताकि वह दिल को छू ले’। उन्होंने अपने आत्मवक्तव्य में माक्र्स, लेनिन, माओ, काॅडवेल, टाॅलस्टाय, दास्तोवस्की, गोर्की, लू शुन, कबीर, प्रेमचंद, चलम, वोपन्ना, वीरेश लिंगम पुतुल, अप्पा राव, रॉल फाॅक्स, लोर्का, स्टीफन स्पेंडर, एडवर्ड गोलिआनो, चिनुआ अचेबे....... सबको केवल याद ही नहीं किया, आज के समय में उनके महत्व को समझा है। यह मात्र नाम उल्लेख नहीं है। वरवर राव की कविताएं अन्य भारती में अनूदित हो चुकी हैं।
वरवर राव की गिरफ्तारी के पीछे सत्ता और व्यवस्था का उनकी रचनाओं से खौफ खाना है ‘वह डर रहा है सपनों से/कलम की नोक से डर रहा है/उसने स्वतंत्रता को जकड़ा है जंजीरों में/अब हथकड़ी के हिलने-डुलने पर/जंजीरों की झंकार से/वह डर रहा है’। वरवर राव को नवंबर 2018 में पुनः गिरफ्तार किया गया। एल्गार परिषद के माओवादी संबंध के आधार पर उनके साथ 10 अन्य सक्रियतावादियों को गिरफ्तार किया गया। भीमा कोरेगांव मुकदमे के तहत 18 महीने न्यायिक हिरासत में रखे जाने के बाद भी उनके विरुद्ध कोई आरोप, अभियोग दायर नहीं किया गया है। इन पंक्तियों के लेखक ने इसी अखबार के अपने दो स्तम्भ में ‘भीमा कोरेगांव से निकले कई सवाल’, 13 अगस्त 2018 और ‘ये गिरफ्तारियां अभिव्यक्ति पर आक्रमण है’, 31 अगस्त 2018 में लिखा था कि भीमा कोरेगांव के पहली जनवरी 2018 के आयोजन के विरोध में मिलिंद एकबोटे ने पंफ्लेट वितरित किए थे और पुलिस महानिरीक्षक विश्वास नांगरे पाटील की रिपोर्ट का उल्लेख किया था कि ‘भीमा कोरेगांव घटना, जातीय हिंसा में शिव प्रतिष्ठान हिंदुस्तान के प्रमुख संभाजी भिंडे और समस्ता हिंदू अगाड़ी के अध्यक्ष मिलिंद एकबोटे की भूमिका थी’। इन दोनों पर क्या कार्रवाई हुई? वरवर राव पर पिछले कई दशकों में 20 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हुए पर एक मुकदमा भी सही साबित नहीं हो सका। अगस्त 2018 से वरवर राव ट्रायल की प्रतीक्षा कर रहे हैं। भीमा कोरेगांव केस में गिरफ्तार किए गए। वे नवी मुंबई के तलोजा जेल में हैं। 26 जून को उनका स्वास्थ्य खराब हुआ था और 2 दिन बाद उन्हें जे जे अस्पताल मुंबई में भर्ती किया गया। तलोजा जेल के अस्पताल वार्ड में भर्ती हुए थे पर वहां स्वास्थ संबंधी सुविधाएं कम थी। पिछले महीने जून में विश्व के 98 बुद्धिजीवियों ने जिनमें नोआम चोम्स्की, पार्थ चटर्जी, होमी के भाभा, न्यूगी वा थ्योंगो, फ्रेडरिक आर जेमसन आदि हैं, कोविड-19 के समय में वरवर राव और साईं बाबा की रिहाई के लिए भारत के राष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से रिहाई की मांग की। साईं बाबा लगभग 90 प्रतिशत विकलांग या पंगु हैं। इन बुद्धिजीवियों ने अपने पत्र में यह लिखा कि 28 मई को वरवर राव जेल में मूर्छित हो गए थे। उन्हें जे जे अस्पताल में भर्ती किया गया था, पर उन्हें पुनः जेल भेज दिया गया। वहां केवल आरंभिक जांच हुई। उनके पारिवारिक सदस्यों को न तो उनसे मिलने दिया गया, ना फोन से बात कराई गई। वरवर राव की पत्नी हेमलता ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी, एनआईए के कोर्ट में जमानत पर उन्हें रिहा किए जाने के लिए अर्जी दी। कोर्ट ने इसे अस्वीकृत किया। बुद्धिजीवी हस्ताक्षरकर्ताओं ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का अपने पत्र में उल्लेख किया है, जो कैदी सहित सभी नागरिक के जीने की गारंटी प्रदान करता है। बुद्धिजीवियों ने उनके जीवन पर ‘संभावित खतरा’ देखा। अनेक अंतरराष्ट्रीय विद्वानो,ं प्रशंसित संस्थाओं जिनमें ‘पेन’ इंटरनेशनल भी है, उन्हें रिहा करने की मांग की है। महाराष्ट्र में कोरोना वायरस सर्वाधिक है। महाराष्ट्र सरकार ने स्वीकार किया है कि तलोजा जेल में कोविड-19 से एक की मृत्यु हुई है। 9 मई 2014 को साईं बाबा अपहृत या गिरफ्तार हुए थे। इनका भी माओवादियों से संबंध बताया गया जो एक प्रतिबंधित पार्टी है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने साईं बाबा पर लगाए गए आरोपों को ‘गढ़ा हुआ’ कहा है और उनके अनुसार उनकी जांच अंतरराष्ट्रीय निष्पक्ष जांच मानकों पर नहीं है। वरवर राव को रिहा करने अथवा जमानत देने की मांग पिछले एक सप्ताह से, विशेषतः उनकी पत्नी और पावना की ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद अधिक जोर पकड़ चुकी है। अब वे जे जे अस्पताल मुंबई में भर्ती हैं और यह आशा एवं कामना की जा रही है कि उनका शीघ्र स्वास्थ्य लाभ होगा।
सही चिकित्सा सेवा-सुविधा का अधिकार सबको है। 12 जुलाई को ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राज्य सरकार से वरवर राव को यथाशीघ्र चिकित्सा उपचार प्रदान करने का अनुरोध किया गया था। भारत भर से लगभग 2000 बुद्धिजीवियों और अनेक सामाजिक संगठन राव के समर्थन में आगे आए। उनके बिगड़ते स्वास्थ्य को लेकर सबकी चिंता स्वाभाविक थी। उनके भतीजे और लेखक एन वेणुगोपाल राव ने उनके बिगड़ते स्वास्थ्य को लेकर केवल चिंता ही प्रकट नहीं की, यह मांग भी की कि उन्हें जेल में मत मारो। जहां तक जेल का सवाल है, वहां कैदियों की संख्या निश्चित संख्या से कहीं अधिक है। तलोजा जेल में कुल 2124 कैदियों को रखने की क्षमता है, पर वहां कैदियों की संख्या तीन हजार के करीब है। वहां कोरोना वायरस के फैलने की अधिक संभावना है। अप्रैल के आरंभ से ही संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने जेल खाने में निर्धारित कैदियों की संख्या से अधिक संख्या होने के कारण इस वायरस के फैलाव की ओर ध्यान दिलाया था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने यह भी कहा था कि ऐसी स्थिति में राजनैतिक कैदियों और विरोधियों को छोड़ा जाए। 2017 में भारत के जेलों में बंद कैदियों में से 68.5 प्रतिशत परीक्षण के तहत अर्थात अंडर ट्रायल थे। बाद के वर्षों में भी स्थिति बेहतर नहीं हुई है। कुछ वर्षों से सरकारी नियमों और नीतियों के विरुद्ध विरोधियों की संख्या बढ़ती गई है जिनमें एक साथ छात्र, शिक्षक, वकील, पत्रकार, कवि, लेखक, मानवाधिकार कार्यकर्ता और उपेक्षित-वंचितों के पक्ष में आवाज उठाने वाले सब है।ं ये सब जेलों में बंद हैं जिनके स्वास्थ की गारंटी सरकार नहीं दे सकती। कोविड-19 के दौर में विचाराधीन कैदियों की रिहाई की मांग बार-बार की गई है। ‘सुरक्षात्मक उपाय’ का संबंध केवल चिकित्सा सुविधा से ही नहीं है। कैदियों के मामले में इसका संबंध न्याय प्रक्रिया से भी है। न्यायालय न्याय देने के लिए है ना कि ‘दया’ और ‘सहानुभूति’ प्रदान करने के लिए। कोविड-19 के समय में इसका संबंध सरकार की जन स्वास्थ संबंधी चिंताओं से भी है। वरवर राव अस्पताल में हैं पर मुख्य सवाल यह है कि उन्हें जमानत मिलेगी या नहीं? वे जेल से बाहर आएंगे या नहीं? सरकार के पास उनके खिलाफ पक्का-पर्याप्त सबूत नहीं है। कोर्ट ने हमेशा ‘जमानत’ को नियम और जेल को अपवाद माना है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार किसी भी अवैध या गैरकानूनी संगठन का सदस्य होना किसी भी व्यक्ति का अपराधी प्रमाणित करने के लिए काफी नहीं है। दुनिया के बुद्धिजीवियों ने राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश को अपने पत्र में संविधान का हवाला दिया है। बड़ा प्रश्न यह है कि भारत में ‘लिबरल डेमोक्रेसी’ संकट में है। सरकार को स्वतंत्र भाषणों का, मौलिक अधिकारों का, लोकतंत्र और भारतीय संविधान का सदैव आदर करना चाहिए। वरवर राव और अन्य कैदियों के स्वास्थ्य से व्यापक अर्थ में भारतीय लोकतंत्र का स्वास्थ्य जुड़ा है। हमें एक साथ नागरिकों के स्वास्थ्य और लोकतंत्र के स्वास्थ्य की चिंता करनी होगी। स्वस्थ और शक्तिशाली भारत के लिए यह आवश्यक है।

-रविभूषण

मो - 9431103960
आज के जनसंदेश टाइम्स में 


Thursday, July 16, 2020

'उबुन्टु' अफ्रीका की एक बेहतरीन कहानी है


"उबुन्टु"

'उबुन्टु' अफ्रीका की एक बेहतरीन कहानी है...

वास्तव में यह अफ्रीका की एक विशिष्ट संस्कृति यानी 'उबुन्टु संस्कृति' से हमारा परिचय कराती है।

एक मानव विज्ञानी ने अफ्रीका के आदिवासी बच्चों से एक खेल खेलने को कहा...

उसने मिठाइयों की एक टोकरी एक पेड़ के पास रख दी

और बच्चों से कहा कि कि वे पेड़ से सौ मीटर दूर खड़े हो जायें।

फिर उस मानव विज्ञानी ने घोषणा की कि जो भी भाग कर सबसे पहले पेड़ के पास पहुंचेगा, मिठाइयों की टोकरी उसकी होगी।

इसके बाद बच्चों को आवाज़ देते हुए उसने कहा, "तैयार...! अब जल्दी से भागो!"...

क्या आप जानते हैं बच्चों ने क्या किया?

उन बच्चों ने एक-दूसरे का हाथ थामा और साथ-साथ पेड़ की तरफ़ दौड़ पड़े। उन्होंने मिठाइयों को आपस में बराबर-बराबर बांट लिया, और ख़ूब आनन्द ले-लेकर खाने लगे।

जब मानव विज्ञानी ने उनसे ऐसा करने का कारण जानना चाहा,

तो उन बच्चों ने कहा– "उबुन्टु।"

जिसका मतलब था–

"हममें से कोई एक भी कैसे खुशी मना सकता है, जब तक कि बाकी बचे लोग दुखी हों?"

उनकी बोली में 'उबुन्टु' का अर्थ है–
"मैं हूं, इसलिये कि हम हैं!"

यह तमाम पीढ़ियों के लिये एक मज़बूत सन्देश हो सकता है।

काश हम में से हर एक का रवैया ऐसा ही होता और हम जहां भी जाते वहां खुशियां बांट सकते!

काश हमारा जीवन भी एक "उबुन्टु" जीवन होता...

काश हम कह सकते...

मैं हूं... इसलिये कि हम हैं!

(अंग्रेज़ी से अनुवाद- राजेश चन्द्र, रीपोस्ट)

यह 'उबुन्टु संस्कृति' उनके लिए प्रमाण और सिख भी है।जो कहते हैं दुनिया में कभी बराबरी नहीं आ सकती और न ही अमीर गरीब खत्म हो सकते हैं। लेक़िन यह संस्कृति हमे यह बताती है कि आदिम युग की दुनिया बराबरी और इंसानियत से भरे हुए मूल्यों की एक मिशाल थी। हम सब को इस संस्कृति से प्रेरणा लेते हुए ऐसे समाज को स्थापित करने के लिए संघर्ष में लग जाना चाहिए। जहां एक मनुष्यों के द्वारा दूसरे मनुष्यों का शोषण असंभव हो जाय।

https://youtu.be/GjVwsgL2i98

81-year-old poet Varavara Rao tests #COVID19 positive


This is to inform you that as per the tentative information received from unnamed sources from JJ Hospital, 81 year old poet, Dr. P. Vara Vara Rao, has been tested  COVID-19 Positive.

The Advocates will bring this critical information to the attention of the Hon'ble Bombay High Court where his Bail Application on Health Grounds is listed tomorrow.

Source:- https://twitter.com/the_hindu/status/1283738479814258688

नागपुर जेल में कोविड-19 फैला : प्रोफेसर जी एन साईबाबा का बिगड़ता स्वास्थ्य




15 जुलाई 2020

प्रेस बयान

जेल अधिकारियों ने प्रोफेसर साईबाबा को अपनी हालत के बारे में वकील व परिजनों को अवगत कराने के लिए विशेष अनुमति दी जिसके बाद डॉ जी एन साईबाबा ने अपने परिवार व वकील को किये सबसे ताजा फोन में सूचित किया है कि नागपुर केंद्रीय जेल में कोविड-19 के फैलाव की स्थिति अनियंत्रित है। जेल प्रशासन के सावधानीवश उठाये उपायों के बावजूद सौ लोग कोविड-19 से संक्रमित हो गये हैं, जिनमें सजायाफ्ता, विचाराधीन कैदियों के साथ जेल सुरक्षाकर्मी भी हैं। संक्रमण व्यापक पैमाने पर तेजी से फैल रहा है और एक के बाद एक बैरेक संक्रमित हो रहा है। आठ जुलाई 2020 को अंडा सेल के सभी 20 कैदियों के नमूने जांच के लिए लिये गये और एक कैदी संक्रमित पाया गया। साईबाबा ने कहा, “बीमारी मेरे बहुत करीब पहुंच चुकी है।‘‘ उन्होंने कहा कि ‘कभी भी‘ यह उनके कक्ष तक पहुंच सकती है। उनके कमजोर स्वास्थ्य और मौजूदा बीमारियों के कारण कमजोर व क्षतिग्रस्त इम्युनिटी के कारण साईबाबा ज्यादा नाजुक स्थिति में हैं। उनके अनुसार जो अधिकारी बैरकों का दौरा करते थे, वह भी कोविड-19 से संक्रमित हुए हैं। इस पर अंकुश लगाने के लिए विशेष सुविधा या उपचार नहीं है। इसके अलावा उनके गंभीर रोगों के लिए भी उन्हें उपचार नहीं मुहैया कराया गया। साईंबाबा (53)  के वायरस से संक्रमित होने का खतरा ज्यादा हैं और एक बार संक्रमित हो गये तो उनका इससे उबरना और बच पाना संभव नहीं होगा। जेल ने उन्हें अपनी रोजाना जरूरतें पूरी करने के लिए भी ‘मददगार‘ मुहैया नहीं कराये हैं और उन्हें गंदगी वाली स्थितियों में रहना पड़ रहा है। विशेषकर संक्रमण के बाद उन्हें नितांत अकेला छोड़ दिया जाएगा। यह भयावह है कि यदि उन्हें कोविड पॉजिटिव पाया गया तो उन्हें सेल में अकेले बंद कर दिया जाएगा और स्वास्थ्य सेवा के लिए परिवार के पास जाने भी नहीं दिया जाएगा। यह उनके लिए निश्चित मौत की सजा है क्योंकि अपने वर्तमान हालात में उनमें संक्रमण आसानी से हो सकता है। 
छह जुलाई 2020 को अपने पिछले फोन कॉल के दौरान उन्होंने मुझे बताया था कि उनके स्वास्थ्य की हालत अच्छी नहीं है। जेल अधिकारी कोविड-10 लॉकडाऊन के दौरान उन्हें दो बार नागपुर सरकारी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल ले गये थे। उन्हें अस्पताल में पांच विभागों में ले जाया गया और उन्हें और टेस्ट कराने की सलाह दी गई व कुछ पेन किल्लर दिये गये। अस्पताल ने एमआरआई-ब्रेन स्कैन व अन्य परीक्षण किये जिनकी रिपोर्ट अभी तक नहीं दी गई हैं। कई बार अनुरोध के बावजूद सितंबर 2018 से पुरानी जांच रिपोर्ट नहीं दी गई हैं। परिजनों के पास चूंकि चिकित्सा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं इसलिए वह उनके स्वास्थ्य संबंधित मुद्दों पर अपने फैमिली डॉक्टर से कोई मार्गदर्शन नहीं ले सकते। 
नागपुर सरकारी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल डॉक्टरों ने 25 जून 2020 को फिर गाल ब्लैडर हटाने के ऑपरेशन की सलाह दी थी। लेकिन उनके बिगड़ते स्वास्थ्य हालात और कोविड-19 महामारी के कारण ऑपरेशन सही नहीं था क्योंकि उसमें संक्रमण का खतरा ज्यादा है। नागपुर सरकारी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल डॉक्टरों ने गर्म व ठंडे पैक के नियमित इस्तेमाल, सोने के लिए चिकित्सकीय बेड और छह तकिये (लगातार हो रहे दर्द से राहत देने के लिए) मुहैया कराने का सु्झाव दिया था, वह भी नहीं मुहैया नहीं कराया गया। 
अब तक उन्हें कोई सहायक अटेंडेंट मुहैया नहीं कराया गया। अटेंडेंट की अनुपलब्धता के कारण वह शौच जाने समेत रोजमर्रा के कार्य तक कर पाने में असमर्थ हैं। उनकी मदद के लिए कोई नहीं है और वह लंबे समय तक गंदे कपड़े व चद्दरों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसा अस्वच्छ माहौल अक्सर एलर्जी, संक्रमण जैसी स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म देता है।
उन्हें मार्च से अखबार नहीं दिये जा रहे हैं। डॉ जीएन साईबाबा ने बताया है कि उनका बायां हाथ लगभग बेकार हो गया है। नर्वस सिस्टम ने दाहिने हाथ को भी प्रभावित किया है। तीव्र दर्द दोनों हाथों में उंगलियों के पोरों तक फैल रहा है। 

पैरोल का पहला आवेदन इस आधार पर खारिज किया गया था कि उनके भाई का घर कोविड कन्टेनमेंट जोन में पड़ता था, जैसा कि साइबराबाद आयुक्त ने बताया था। एक महीने बाद भाई ने फिर साईबाबा के पैरोल का आवेदन किया पर संबंधित जेल अधिकारियों से कोई प्रतिसाद नहीं मिला।
14 जुलाई 2020 को बांबे उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ के समक्ष चिकित्सकीय आधार पर अर्जी दी गई और माननीय उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष को दस दिन का समय अपना जवाब देने के लिए दिया और सुनवाई जुलाई के अंत में करना निश्चित किया।

डॉ जी एन साईबाबा हाथों की मांसपेशियों की क्षति के कारण तीव्र शारीरिक दर्द से गुजर रहे हैं। उन्हें पैंक्रिया में सूजन है, उच्च रक्तचाप है, हृदय की पेशियों का रोग है, पीठ में दर्द है, उन्हें चलने-फिरने में दिक्कत है और अनिद्रा के रोग से भी ग्रस्त हैं। उनका स्वास्थ्य और बिगड़ा अपर्याप्त चिकित्सकीय सुविधाओं के कारण, दर्द से राहत न मिलने के कारण। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के पदाधिकारियों के हस्तक्षेप के बावजूद अदालतों ने उन्हें लगातार जमानत देने से इंकार किया है। कैदियों के लिए बिना जमानत अनावश्यक देरी अनुच्छेद 21 के तहत जीवन एवं आजादी के मौलिक अधिकार से वंचित करना है।
  भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने जीवन के अधिकार को बरकरार रखा है यह कहते हुए, “किसी मनुष्य के प्रति ऐसा व्यवहार जो मानवीय गरिमा को ठेस पहुंचाए, परिहार्य यातनाएं दे और इंसान को पशु के स्तर पर ला दे तो यह मनमानी होगी और अनुच्छेद 14 के तहत इस पर सवाल किया जा सकता है।“ भारत नागरिक व राजनीतिक अधिकारों अंतरराष्ट्रीय नियमों (आईसीसीपीआर) से भी बंधा है जो इंसानों की गरिमा और मुक्त मनुष्यों के नागरिक व राजनीतिक आजादी प्राप्ति के आदर्श को पहचानती है। इसके अलावा भारत ने एक अक्तूबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र के विकलांगों के अधिकार समझौते का भी अनुमोदन किया है। भारत ने कैदियों के व्यवहार पर मापक न्यूनतम नियमों (नेल्सन मंडेला नियम भी कहे जाते हैं) पर संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव भी अपनाया है। यह नियम, समझौते और प्रस्ताव सभी व्यक्तियों, कैदियों, विकलांगों को जीवन व गरिमा सुनिश्चित करते हैं और इसके अमल के लिए आवश्यक मापदंडों की रूपरेखा भी बताते हैं। 

कोविड-19 का ऐसे स्थान पर प्रसार डॉ जी एन साईबाबा के लिए मृत्युदंड की तरह होगा। डॉ जी एन साईबाबा की नाजुक स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए, हम महाराष्ट्र सरकार से और केंद्र सरकार से अनुरोध करते हैं कि उन्हें तुरंत जमानत या पैरोल पर रिहा किया जाए ताकि उन्हें हैदराबाद या दिल्ली में जहां उनके पारिवारिक सदस्य रहते हैं, समुचित चिकित्सकीय उपचार मुहैया कराया जा सके। 

लोकतंत्र की कैद सभी आवाजों को रिहा करें और उनके जीवन के अधिकार को बचाएं। 

ए एस वासंता कुमारी

डा जीएन साईबाबा की पत्नी
नई दिल्ली 

जी सूर्यवती 
जीएन साईबाबा की मां

और 
अन्य परिजन

गुना की यह तस्वीर, बच्चों की गोद में बाप की नहीं है, भारत की मरी हुई आत्मा और जनता की है



गुना के कलेक्टर और एस एस पी को डिसमिस कर देना चाहिए। ये बीमारी ऐसे ठीक नहीं होगी। सदियों से घुसी हुई है और आज़ादी के बाद भी बढ़ती जा रही है। ये अफ़सर कुर्सी पर जाकर करते क्या हैं ? क्यों नहीं तंत्र को सत्ता के ग़ुरूर से मुक्त करते हैं, वहाँ पहुँच कर भी इसकी सेवा उठाने लगते हैं। इसलिए इन दोनों अफ़सरों को नौकरी से निकालने की माँग करनी चाहिए। कोई तबादला नहीं कोई निलंबन नहीं। सीधे बर्खास्त करना चाहिए दोनों को। वैसे भी लोगों को फ़र्ज़ी केस में फँसाने के अलावा इनका कोई काम तो होता नहीं। तबादला धोखा है। इन्हें बर्खास्त करना चाहिए। इन अफ़सरों को शर्म भी नहीं आती होगी। न आएगी।

गुना का यह वीडियो और तस्वीर देखिए। पुलिस की मार खाने और कीटनाशक दवा पी लेने के बाद अपने पिता को गोद में लेकर चीखते बच्चों से आपकी आत्मा नहीं परेशान होती है तो आप इस लोकतंत्र के मरे हुए नागरिक हैं। आप एक लाश हैं। वैसे मुर्दा कहने और कहलाने से भी आपको फ़र्क़ नहीं पड़ता।

राम कुमार अहिरवार और सावित्री देवी ने तीन लाख का लोन लेकर एक खेत में फसल उगाई । जब फसल बोई गई और उगाई गई तब क्या किसी ने नहीं देखा ? इनके साथ किसी ने सरकारी ज़मीन बताकर धोखा किया तो कार्रवाई उस पर होनी थी या इन गरीब पर? कोई दूसरा रास्ता नहीं था हटाने का? हर काम बर्बरता से ही क्यों ?

खड़ी फसल पर जे सी बी मशीन चलाई गई। राम कुमार ने रोका तो नहीं माने। कीटनाशक पी ली। बचाने के लिए राम के भाई आगे आए तो पुलिस लाठियाँ मारने लगी। उनके बच्चे अपने पिता को गोद में लेकर बिलख रहे हैं। इन बच्चों को भी गालियाँ दी गई हैं। राम कुमार और सावित्री देवी ज़िंदा हैं। दोनों को पुलिस ने बुरी तरह मारा है। प्रियंका दुबे ने लिखा है कि पुलिस ने महिला के कपड़े फाड़ने की भी कोशिश की है।

यह भी जानकारी है कि जिस भू माफिया ने इन्हें किराये पर दी थी वो भी अनुसूचित जाति का है। तो उस पर सीधे कार्रवाई नहीं होनी थी ? प्रशासन क्या कर रहा था जब वह किसी गरीब से पैसे लेकर सरकारी ज़मीन किराए पर दे रहा था ?

आप कैसा सिस्टम चाहते हैं ? ऐसा कि किसी को फँसा दो, किसी के साथ ये इंसाफ़ करो ? क्या भारत इस तरह का विश्व गुरु बनेगा? और ये विश्व गुरु होता क्या है? एक थाना इस देश में बेहतर तरीक़े से नहीं चलता है। शर्म आनी चाहिए कि आप ख़ुद को जनता कहते हैं। शर्म आनी चाहिए। शर्म आनी चाहिए।

( यह टिप्पणी देश के जाने माने पत्रकार रवीश कुमार के फेसबुक वाल से साभार ली गयी है )

Sunday, July 5, 2020

शिक्षा में ‘बैंकिग व्यवस्था’ के बरक्श ‘उत्पीड़ितों के शिक्षा शास्त्र’ की खोज



- डॉ. दीनानाथ मौर्य


“मेरी माँ ने मुझे सिखाया था की ईश्वर बहुत अच्छा है, इसलिए मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि समाज में जो वर्गभेद है, उसके लिए न ईश्वर को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है न नियति को…मुझे इस कथन पर कभी विश्वास नहीं हुआ कि ‘मैंने अपना निर्माण स्वयं किया है’ दुनिया में कोई व्यक्ति अपना निर्माण स्वयं नहीं करता. शहर के जिन कोनों में ‘स्वनिर्मित’ लोग रहते हैं, वहीं आस-पास बहुत से अनाम लोग भी छिपे रहते हैं.” –पाओलो फ्रेरे
‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ पुस्तक लैटिन अमरीका के ब्राजील वासी पाओलो फ्रेरे ने लिखी है. पाओलो फ्रेरे को हम ऐसे शिक्षाशास्त्री के रूप में जानते हैं जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में न सिर्फ विश्वविद्यालयी शिक्षा ग्रहण की; बल्कि वे लंबे समय तक अपने देश में चलाये जा रहे साक्षरता अभियान से भी जुड़े रहे. उन्होंने रेसिफे विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर के रूप में शिक्षा के दर्शन और इतिहास का अध्यापन भी किया. अपने लंबे अनुभव और अध्ययन से वे इस निष्कर्ष पर पहुचें कि-“शिक्षा भी एक राजनीति है और जिस प्रकार राजनीति वर्गीय होती है,उसी तरह शिक्षा भी वर्गीय होती है.” ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ पुस्तक भी उनके इस निष्कर्ष को पुष्ट करती है. शिक्षा पर उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखी हैं-‘कल्चर एक्शन फॉर फ्रीडम’, ‘एजुकेशन फॉर क्रिटिकल कांशसनेस’, ‘एजुकेशन: दी प्रैक्टिस ऑफ़ फ्रीडम’, ‘दी पालिटिक्स ऑफ़ एजुकेशन’, और ‘पेडोगागी ऑफ़ होप’ प्रमुख हैं.
“यह पुस्तक उस परम्परागत अर्थ में शिक्षाशास्त्र का विवेचन नहीं है, जिस अर्थ में बी.एड. और एम.एड. की पाठ्यपुस्तकों में हमें देखने को मिलता है. इसमें विवेचित शिक्षाशास्त्र का आधार काफी व्यापक है. पिछले ढाई दशकों के दौरान ज्ञान की विभिन्न शाखाओं के चिंतन को प्रभावित करने वाली विश्व की यह एक अनोखी पुस्तक है. शिक्षाशास्त्र और शिक्षाकर्मियों की सोच को प्रभावित करने के साथ ही, समकालीन दर्शन, समाजशास्त्र, विज्ञान, साहित्य, अनुसंधान की विभिन्न भिन्न शाखाओं और आलोचना आदि क्षेत्रों में कार्यरत लोगों की सोच में भी इसका प्रभाव देखा जा सकता है. जिस समाज में प्रभुत्वशाली अभिजनों का अल्पतंत्र बहुसंख्यक जनता पर शासन करता है. वह अन्यायपूर्ण और उत्पीड़नकारी समाज होता है. ऐसी समाजव्यवस्था मनुष्यों को वस्तुओं में बदलकर उनको आमानुषिक बनाती है. जबकि मनुष्य का अस्तित्वमूलक और ऐतिहासिक कर्तव्य पूर्णतर मनुष्य बनना है.” (पुस्तक के प्लैप कवर से उद्धृत )
‘ग्रंथ शिल्पी’ प्रकाशन से शिक्षाशास्त्र के नये क्षितिज श्रृखंला के अंतर्गत प्रकाशित इस पुस्तक को अंग्रेजी से हिंदी भाषा में रमेश उपाध्याय ने अनूदित किया है. जिसमें कुछ शब्दों पर टिप्पणी लिखने का कार्य पत्रकार रामशरण जोशी ने किया है. पुस्तक की प्रस्तावना NCERT के पूर्व निदेशक शिक्षाविद कृष्ण कुमार ने लिखी है. प्रस्तावना में कृष्णकुमार जी ने फ्रेरे के शैक्षिक दर्शन और इस पुस्तक की जिन तीन महत्वपूर्ण बातों की ओर इशारा किया है उनमें से पहली बात है कि फ्रेरे के शैक्षिक दर्शन और उनके द्वारा आजमाई गई शिक्षण विधियों में निहित पूर्व धारणाएं हमारे समय की तीन बड़ी चिंतन धाराओं से जुड़ी हुई हैं जिनका फलक शिक्षण से कहीं अधिक व्यापक है. ये धाराएं हैं मार्क्सवाद, मनोविश्लेषणवाद और अस्तित्ववाद . इन तीनों से विचार-बिंदु लेकर और अपनी मानववादी नज़र और ठोस अनुभवों से उपजी समझ को जोड़कर फ्रेरे ने आज की दुनिया के संकट और उसके सन्दर्भ में शिक्षा की भूमिका को चित्रित किया है. दूसरी यह बात ध्यातव्य है कि फ्रेरे का शिक्षणशास्त्र हमें यह बताता है कि समस्या को ‘गरीबी’ कहना ही एक गलत प्रस्थान बिंदु है. गरीबी उत्पीड़न का वह सुविधाजनक और भ्रामक नाम है जिसे लेकर संपन्न मनुष्य अपनी भूमिका से मानसिक तौर पर बरी हो रहता है. उत्पीड़ित को गरीब बताकर वह अपनी स्थिति और हैसियत को वैध ठहराने में समर्थ होता है. तीसरी और आखिरी जिस महत्त्वपूर्ण बात की चर्चा कृष्ण कुमार जी करते हैं वह यह है कि अच्छी शिक्षा किसी सामूहिक (वह भी संघर्षशील) कार्यक्रम के प्रसंग में ही पायी या दी जा सकती है, एकांत में बैठकर नहीं. साक्षरता के संदर्भ में फ्रेरे के शिक्षाशास्त्र का एक तकनीकी पक्ष भी है, लेकिन वह तकनीकी पक्ष सामाजिक आंदोलन वाले पक्ष की तुलना में काफी गौण है.
1980 में लिखी गयी इस पुस्तक पर 1996 में कृष्ण कुमार द्वारा किया गया उपर्युक्त मूल्यांकन कई मायनों में महत्वपूर्ण है–विशेषतौर पर जब हम भारतीय समाज और स्कूली शिक्षा व्यवस्था के साथ काम करते हुए उसके अध्ययन और विश्लेषण करने के कार्य में भी लगे हों. कथाकार और समीक्षक रमेश उपाध्याय द्वारा अनूदित यह पुस्तक कुल चार प्रकरणों में विभाजित है. प्रकरणों या पाठों का विभाजन विचार और संवाद के एक निश्चित क्रम में है, जो पाठक को शिक्षा जगत के दार्शनिक प्रश्नों और जिज्ञासाओं के साथ स्कूल के व्यवहारिक पहलुओं से भी परिचित कराता है. पुस्तक में दिए गये सन्दर्भ चूंकि भारतीय सन्दर्भों से अलग है इसलिए सामान्य पाठक को पुस्तक के साथ गुजरते हुए भाषिक और दार्शनिक शब्दावलियों के लिहाज से थोडा कठिनाई होती है. पर अनुवादक ने पुस्तक के आरम्भ में कुछ सामान्य बातों की ओर इशारा करके और अंत में अंग्रेजी शब्द सूची देकर इस समस्या को दूर करने का यथा संभव प्रयास किया है.
पाओलो फ्रेरे
पुस्तक का पहला अध्याय ‘उत्पीड़ितों के शिक्षाशास्त्र’ (पेडोगागी ऑफ़ द आप्रेस्ड) के औचित्य और मुक्ति की पारस्परिक प्रक्रिया को केंद्र में रखकर लिखा गया है. लेखक यह मानता ही कि मुक्ति एक प्रसव है और यह पीड़ादायक है. इससे जो मनुष्य पैदा होता है, एक नया मनुष्य होता है, जिसका जीवित रहना तभी संभव है, जब उत्पीड़क-उत्पीड़ित के अंतर्विरोध के स्थान पर सभी मनुष्यों का मानुषीकरण हो जाए. मनुष्य के अन्दर स्वयं के प्रति यह चेतना विकसित हो जाये कि वह समझ सके की दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है वह मानव निर्मित और परिवर्तन शील है. ‘उत्पीड़ितों के शिक्षाशास्त्र’ (पेडोगागी ऑफ़ द आप्रेस्ड) की शुरुआत और औचित्य का बुनियादी फलसफा दरअसल यही है. शिक्षा का कार्य मानुषीकरण की प्रक्रिया को तेज करना, विकसित करना और फैलाना है. शिक्षा को मुक्तिदायी होना चाहिए, उन तमाम रुढियों से जो मानवता विरोधी और इतिहास विरोधी है. बकौल फ्रेरे–“जनता का अपने आचरण के जरिये यथार्थ में आलोचनात्मक हस्तक्षेप करना जरूरी है. यहीं पर हैं उत्पीड़ितों के शिक्षाशास्त्र की जड़ें; उस शिक्षाशास्त्र की जड़ें, जो अपनी मुक्ति के संघर्ष में संलग्न मनुष्यों का शिक्षाशास्त्र है.” इस रूप में यह केवल उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र ही नहीं रहता बल्कि मनुष्य की मुक्ति का शिक्षाशास्त्र बन जाता है. मनुष्य की मुक्ति केवल पेटभर खाना खा लेने से नहीं हो सकती, उसकी मुक्ति का सपना तो सही रूप में चेतना से जुड़ता है. जहाँ से वह सोचना और चीजों को समझना शुरू करता है. अतः जिसे हम उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र कह रहे हैं उसे सरल शब्दों में यह कहें तो गलत न होगा कि वह दरअसल समाज को विचारानुषंगी बनाने की प्रकिया है. जिसमें आलोचनात्मक चिंतन और रूढ़ियों से मुक्ति का सपना हो.
पुस्तक का दूसरा अध्याय सीधे स्कूली शिक्षा व्यवस्था को केंद्र में रखता है. जिसमें समाज और स्कूल का सम्बन्ध, समाज निर्माण में विद्यालय की भूमिका, शिक्षक-छात्र सम्बन्ध आदि प्रश्नों को साथ में लेकर परम्परागत शिक्षण पद्धति की आलोचना एवं नवोन्मेष की दिशा के कुछ सूत्र सुझाये गये है. इस अध्याय में फ्रेरे परम्परागत शिक्षण प्रणाली को वर्णनात्मक पद्धति कहते हैं. जिसमें शिक्षक को ज्ञानी माना जाता है और छात्र को कोरा कागज. इस पद्धति में रटन्त प्रणाली विकसित होती है जो विद्यार्थियों को खाली बर्तन (पात्र) बना देती है और शिक्षक को भरा हुआ ज्ञान का पात्र, और फिर इसी के साथ विकसित होती है सिखाने की अवैज्ञानिक विधियाँ. इसी के तहत शिक्षा बैंक में पैसा जमा करने की भांति विद्यार्थियों में ज्ञानराशि जमा करने का काम बन जाती है, जिसमें शिक्षक जमाकर्ता होता है और विद्यार्थी जमादार (डिपोजिटरी) होते हैं. इस शिक्षा व्यवस्था के कुछ लक्षणों को फ्रेरे ने सूत्रबद्ध किया है. जैसे-शिक्षक पढ़ाता है और छात्र पढ़ाए जाते हैं. शिक्षक सब कुछ जानता है और छात्र कुछ भी नहीं जानते. शिक्षक सोचता है और छात्रों के बारे में सोचा जाता है. शिक्षक बोलता है और छात्र सुनते हैं–चुपचाप. शिक्षक अनुशासन लागू करता है और छात्र अनुशासित होते हैं. शिक्षक अपनी मर्जी का मालिक है, वह अपनी मर्जी चलाता है और छात्रों को उसकी मर्जी के मुताबिक चलना पड़ता है. शिक्षक कर्म करता है और छात्र उसके कर्म के जरिये सक्रिय होने के भ्रम में रहते हैं. शिक्षक पाठ्यक्रम बनाता है और छात्रों को (जिनसे पाठ्यक्रम बनाते समय कोई सलाह नहीं ली जाती) वही पढ़ना पड़ता है. शिक्षक अपने पेशेवर अधिकार को ज्ञान का अधिकार समझता है (स्वयं को अपने विषय का अधिकारी विद्वान समझता है) और उस अधिकार को छात्रों की स्वतंत्रता के विरुद्ध इस्तेमाल करता है. शिक्षक अधिगम की प्रक्रिया का कर्ता होता है और छात्र महज अधिगम की वस्तुएं.
समूची पुस्तक में फ्रेरे इस तरह की शिक्षा व्यवस्था को ख़ारिज करते हैं और इसके विकल्प के रूप में एक नई व्यवस्था की वकालत करते हैं जिसे उन्होंने ‘समस्या-उठाऊ’ शिक्षा की पद्धति कहा है. जहाँ बैंकिंग शिक्षा सृजनात्मक-शक्ति को कुंठित और सौन्दर्य चेतना को अवरुद्ध करती है, वहीं समस्या-उठाऊ शिक्षा में निरंतर यथार्थ का अनावरण होता रहता है. जहाँ बैंकिंग शिक्षा चेतना को डूब की दशा में बनाए रखने की कोशिश करती है, वहां समस्या-उठाऊ शिक्षा चेतना को उभरने तथा यथार्थ में आलोचनात्मक हस्तक्षेप करने का प्रयास करती है. यह मनुष्य को सचेत प्राणी मानकर चलती है और उसके अंदर सोचने-समझने की क्षमताओं का विकास करती है. इसमें (समस्या-उठाऊ शिक्षा वयवस्था में) “अब शिक्षक महज वह नहीं रहता है ‘जो पढ़ाता है’ बल्कि छात्रों से संवाद करते समय स्वयं भी उनसे पढ़ता है. दूसरी तरफ छात्र भी वे नहीं रहते ‘जो पढ़ते हैं’, बल्कि शिक्षक से संवाद करते समय पढ़ने के साथ-साथ पढ़ाते भी हैं. शिक्षक और छात्र, दोनों उस प्रक्रिया के लिए उत्तरदायी हो जाते हैं, जिसमें सभी की वृद्धि होती है. इस प्रक्रिया में ‘अधिकार’ पर आधारित तर्कों की कोई वैधता नहीं रहती, क्योंकि यहाँ आधिकारी को यदि काम करना है तो स्वतंत्रता उसके विरुद्ध नहीं बल्कि उसके पक्ष में होना पड़ेगा. यहाँ न तो कोई दूसरे को शिक्षित करता है, न स्वयं शिक्षित होता है. यहाँ मनुष्य एक-दूसरे को शिक्षित करते हैं और उनके बीच में होता है विश्व, अर्थात संज्ञेय वस्तुएं, जो बैंकिंग शिक्षा में शिक्षक की अपनी वस्तुएं होती है.” निष्कर्ष यह कि बैंकिंग व्यवस्था की शिक्षा जहाँ छात्रों को सहायता की वस्तु मानती है वहीं समस्या-उठाऊ शिक्षा उन्हें आलोचनात्मक ढंग से सोचने वाला बनाती है और अपनी शिक्षाशास्त्रीय पद्धतियों में सृजनात्मकता को आधार बनाकर चलती है. यह विद्यार्थियों को एक सम्पूर्ण मनुष्य मानती है जो ज्ञान का निर्माण करते हैं, न कि कोरा कागज़; जिन पर कुछ भी अंकित किया जा सकता है.
पुस्तक का तीसरा अध्याय इस पर केन्द्रित है कि शिक्षा में विषय तो एक साधन होते हैं जिनके जरिए हम दुनिया को और अपने आप को समझते हैं; असल जरूरत तो समूचे परिप्रेक्ष्य को समझने की है. जिसके लिए फ्रेरे चिंतन और कर्म में आपसी संवाद को जरूरी मानते हैं. इस क्रम में ज्ञान का जो निर्माण होता है उसमें परिणाम का उतना महत्त्व नहीं है जितनी प्रक्रिया का. परिवेश से जुड़ी हुई कुछ बुनियादी अवधारणाओं के निर्माण का कार्य हमारी प्राथमिक कक्षाओं की अनिवार्य शर्त होनी चाहिए बजाय की सूचनाओं के संग्रहण के. अवधारणाओं के जानने के साथ ही बातचीत और ज्ञान के अन्य स्रोतों की ओर बढ़ा जा सकता है जो छात्रों में कल्पना और चिन्तन के विकसित होने के अवसर देते है. जिससे आलोचनात्मक समझ के विकास में सहायता मिलती है.
पुस्तक के चौथे अध्याय में सांस्कृतिक कर्म की संवादात्मक और संवाद विरोधी प्रक्रियाओं में ढलकर विकसित होने वाले सिद्धांतों का विश्लेषण किया गया है. कुछ संवाद विरोधी और संवादात्मक सिद्धांतों की विस्तार से चर्चा करते हए लेखक का निष्कर्ष है कि –“संवाद विरोधी कर्म के सिद्धांत में सांस्कृतिक आक्रमण चालबाजी (तिकड़म) के लक्ष्यों के लिए काम करता है, चालबाजी अभिजिति के लक्ष्यों के लिए काम करती है, और अभिजिति प्रभुत्व के लक्ष्यों के लिए काम करती है. सांस्कृतिक संश्लेषण संगठन के लक्ष्यों के लिए काम करता है और संगठन मुक्ति के लक्ष्यों के लिए काम करता है.
अभिजिति, विभाजन और शासन, चालबाजी, सांस्कृतिक आक्रमण, सहयोग, मुक्ति के लिए एकता, संगठन, सांस्कृतिक संश्लेषण आदि बिन्दुओं पर विस्तार से चर्चा की गयी है. उत्पीड़न से मुक्ति वहीं से शुरू होती है जब “मनुष्य को स्वयं ही अपने श्रम का स्वामी हो, मानव का शरीर समाज का ही एक अंग है, और एक मानवीय प्राणी को न तो खरीदा जा सकता है और न ही वह स्वयं को बेच सकता है, इन तथ्यों की आलोचनात्मक चेतना प्राप्त कर लेता है . ऐसा करना यथार्थ का मानवीकरण करके मनुष्यों को मानवीय बनाने के लिए यथार्थ के प्रामाणिक रूपांतरण में संलग्न होना है. और शिक्षा में हमें कुछ ऐसी युक्तियों का विकास करना होगा जिससे हम इस दिशा में आगे बढ़ सकें.”
यह कहा जा सकता है कि पाओलो फ्रेरे के शिक्षा दर्शन का मूल आधार है, उत्पीड़ितों और दलितों का विवेकीकरण करना. यानी उनमें यथार्थ के प्रति सजगता पैदा करना, उसे अपने पक्ष में बदलने के लिए संघर्ष का मार्ग तलाशना. फ्रेरे यह मानते हैं कि बिना विवेकीकरण के अक्षर ज्ञान (साक्षर होना) अर्थहीन है. व्यक्ति को साक्षर बनाकर परिवेश और उसमें क्रियाशील विभिन्न सामाजिक शक्तिओं के प्रति उसे जागरूक और सक्रिय बनाना भी हमारी शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए. एक बच्चे में विवेकीकरण की यह प्रक्रिया, जो की उसके घर से ही शुरू हो चुकी होती है, स्कूल को उसके विकास में सहायक बनना चाहिए बजाय कि उसको अवरोधित करने के. विवेकीकरण से चेतना का विकास होता है और आलोचनात्मक समाज निर्माण की प्रक्रिया भी शुरू होती है. कई तरह के अनुसंधान बताते हैं कि इस तरह की स्कूली प्रक्रिया से निकले हुए लोगों में अक्षर ज्ञान के साथ सामाजिक वास्तविकता को समझने का एक क्रिटिकल एप्रोच भी होता है जो की सही मायने में शिक्षा का लक्ष्य मायने में शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिए.


पुस्तक- उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र

लेखक- पाओलो फ्रेरे

हिंदी अनुवादक- रमेश उपाध्याय

प्रकाशक- ग्रंथशिल्पी(इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड ,दिल्ली.
(लेखक एन.सी.ई.आर.टी.नई दिल्ली में प्रोजेक्ट फ़ेलो रहे हैं. वर्तमान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं)


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