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Saturday, August 21, 2021

यौन हिंसा के खिलाफ़ BHU स्टूडेंट्स का विरोध प्रदर्शन

 


आज दिनांक 21 अगस्त को BHU कैंपस में यौन हिंसा के खिलाफ़ छात्र-छात्राओं ने सेंट्रल ऑफिस में विरोध प्रदर्शन किया और वाइस चांसलर के नाम पर ज्ञापन सौंपा।


कुछ ही दिन पहले त्रिवेणी हॉस्टल की एक लड़की के साथ तीन लड़कों ने करीब आधे घंटे तक यौन हिंसा की और उसके दोस्त को भी पीटा।

 इस घटना के दौरान और बाद में प्रॉक्ट्रियल बोर्ड का बेहद ढीला और असंवेदनशील रवैया देखने को मिला।

यह केवल एक घटना ही नहीं, कैंपस में लगातार ऐसी घटनाएं होती आ रही हैं ,कुछ मामले सामने आते हैं कुछ नही ।



आए दिन सड़क पर लंपट लड़के लड़कियों पर अश्लील कमेंट करते हैं । लड़कियों के साथ छेड़खानी करते हैं । प्रशासन सुरक्षा देना तो दूर यौन हिंसा करने वाले लोगों पर कोई कार्यवाही नहीं करता है ।


प्रशासन को यह पूरी जिम्मेदारी है कि विश्विद्यालय में पढ़ने वाले हर विद्यार्थी की सुरक्षा की जिम्मेदारी ले । परंतु इसके उलट सत्ताधारी पार्टी के चमचे जो आए दिन यौन हिंसा जैसी घटिया हरकतों में लिप्त है, उनके बारे में जानते हुए भी यह दलाल प्रशासन उन्हें बचाता है।


अपनी बात रखते हुए छात्राओं ने कहा कि बीएचयू देश में तीसरी रैंक यूनिवर्सिटी होने के बावजूद महिला सुरक्षा के नाम पर बहुत पिछड़ा है। 



इस मुद्दे पर भले ही एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया हो परंतु हमारा आंदोलन केवल इस मुद्दे पर न्याय मांगने के लिए नहीं अपितु कैंपस में आए दिन हो रही यौन हिंसा की घटनाओं को खत्म करने के लिए और महिलाओं के लिए एक सुरक्षित माहौल बनाने के लिए व प्रशासन को उसकी जिम्मेदारी का एहसास कराने के लिए करना जरूरी है।


प्रशासन और सरकार महिला सुरक्षा का झूठा स्वांग  रचना छोड़ दे । जिन पार्टियों के नेता अपने तमाम भाषणों में महिला सशक्तिकरण का इस्तेमाल करते है उसी के नेता और छात्र संगठन बलात्कार और छेड़खानी जैसे मामलों में शामिल होते हैं । छात्राओं ने बीएचयू प्रशासन को चेतावनी दी कि अगर वे यौनिक हिंसा को रोकने की बात को गंभीरता से नही लेते हैं तो स्टूडेंट्स 2017 वाले आंदोलन से भी बड़ा आंदोलन खड़ा करने को मजबूर होंगे । 


विरोध प्रदर्शन में पूजा, शुभम, राधिका, योगेश , चंदन, अभिषेक, आकांक्षा, इप्शिता, कमल, राकेश, सुमित, खेता, अवनीश शामिल हुए ।

Thursday, August 19, 2021

तालिबान-अमेरिका विमर्श में 'काबुलीवाला' कहाँ है?


 

हम अपने बचपन में अफ़गानिस्तान को रवीद्रनाथ टैगोर की कहानी और बलराज साहनी की फिल्म 'काबुलीवाला' से ही पहचानते थे. छोटे छोटे बच्चों को किशमिश बादाम बांटता और झोले में रखी जादू की छड़ी से उन्हें परी बनाता 'काबुलीवाला'.


लेकिन पिछले करीब 40 सालों में अमेरिका और रूस ने अफ़गानिस्तान के सीने पर जो गन्दा युद्ध थोपा है, उसके गु़बार में यह काबुलीवाला कहीं खो गया. हालाँकि आप यह भी कह सकते हैं कि इसी दौरान वह तालिबानी हो गया होगा. लेकिन मुझे यह स्वीकार करने में दिक्कत है. एक हिन्दू बंगाली लड़की मिनी में अपनी बेटी की तस्वीर देखने वाला रहमत यानी 'काबुलीवाला' तालिबानी तो नहीं ही हो सकता.


'काबुलीवाला' और उसकी बेटियों को आज अफ़गानिस्तान में खोजने के लिए, थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी. भारत के 'मुख्यधारा' की मीडिया और स्टूडियो में उछलते-कूदते एंकरों द्वारा उठाये गए गर्दो-गुबार से बाहर निकल कर देखना होगा.


आइये मैं, आपको इस 'काबुलीवाला' की एक 'बेटी' से मिलवाता हूँ और उससे पूछता हूँ कि अमेरिका और तालिबान में किसे चुनना ठीक रहेगा.


अफ़गानिस्तान में महिलाओं का एक भूमिगत संगठन है- 'रावा' (Revolutionary Association of the Women of Afghanistan) इसकी एक कार्यकर्त्ता सामिया वालिद [Samia Walid] 2019 में दिए एक इंटरव्यू में कहती है-''अमेरिका ने 'महिला अधिकारों' के बहाने अफ़गानिस्तान पर हमला किया. लेकिन पिछले 18 सालों में हमने क्या पाया? सिर्फ हिंसा, हत्या, यौनिक हिंसा, आत्महत्या और दूसरी विपत्तियां. अमेरिका ने अफ़गान महिलाओं के सबसे घृणित दुश्मन इस्लामिक कट्टरपंथियों को सत्ता में बैठाया. पिछले 4 दशकों से यही साम्राज्यवादियों की रणनीति है. जिहादी, तालिबान, और आईएसआईएस [ISIS] जैसे इस्लामिक कट्टरपंथियों को बढ़ावा देकर, जो न सिर्फ हत्यारे अपराधी हैं, बल्कि कट्टर नारी विरोधी हैं, वास्तव में अमेरिका ने ही हम औरतों का दमन किया है.


हम अफ़गान औरतों की मुक्ति को साम्राज्यवादी औपनिवेशीकरण, इस्लामिक कट्टरपंथ और कठपुतली सरकार से मुक्ति में देखते हैं.


अमेरिका ने पढ़ी लिखी औरतों को सीमित मात्रा में सरकार, और दूसरी सस्थाओं. एनजीओ, नागरिक समाज, में सजावटी गुड़िया की तरह रखा हुआ है. इसका दोहरा उदेश्य है- एक, अमेरिका इन महिलाओं का इस्तेमाल अफ़गान औरतों की वास्तविक स्थिति को दुनिया से छुपाने के लिए करता है. और इसे अपने थकाऊ युद्ध को जायज़ ठहराने के लिए इस्तेमाल करता है. दूसरा, ऐसी पढ़ी लिखी औरतों को अपने साथ रखकर वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि महिलायें क्रांतिकारी संघर्षो में भागीदारी न करे.''


यानी जनवादी-समाजवादी अफगानिस्तान की लड़ाई में लगी इन महिलाओं की यह मजबूरी नहीं है कि वे तालिबान और अमेरिका में से एक को चुने. चुनाव जीवन और मृत्यु के बीच होता है. मौत और मौत के बीच कैसा चुनाव? काबुलीवाले की बेटियां हमें यही बताती हैं.


आइये अब मै आपको 'काबुलीवाला' के बेटों से मिलवाता हूँ. और देखता हूँ कि उनकी इस मसले पर क्या राय है.


2001 में अफ़गानिस्तान पर अमेरिका के आक्रमण के ठीक 3 साल बाद अफ़गानिस्तान की 5 कम्युनिस्ट पार्टियों ने मिलकर 'अफ़गानिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी [माओवादी]' का गठन किया. तभी से यह इस्लामिक कट्टरपंथ और अमेरिकी साम्राज्यवाद, दोनों से लड़ रहा है। 

इसके एक संस्थापक सदस्य [जिनकी 2019 में मृत्यु हो गयी] कामरेड जिया ने एक पत्रिका 'इटरनल फ्लेम' [Eternal Flame] में 2011 में एक लेख लिखा- 'तालिबान लड़ेगा या साम्राज्यवादियों-कठपुतली सरकार के साथ समझौते में जायेगा?' [आपको याद होगा कि 2011 में ही अमेरिका ने एलान कर दिया था कि 2014 तक वे अफगानिस्तान से निकल जायेंगे. लेकिन भिन्न-भिन्न कारणों से यह टलता रहा.] 2011 में लिखी यह पंक्तियाँ एक तरह से भविष्यवाणी साबित हुई. और तालिबान अमेरिका के साथ समझौते में जाकर 'शांतिपूर्ण' तरीके से सत्ता पर काबिज़ हो गया.


हालाँकि यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि अमेरिका को अपने देश से भगाने की भावना के साथ आम जनता का एक हिस्सा भी तालिबान के साथ था, लेकिन किसी संगठन का चरित्र निर्धारण तो उसके नेतृत्व से ही होता है, जो निसंदेह अफ़गानिस्तान की घोर प्रतिक्रियावादी सामंती ताकते हैं.


तालिबान और अमेरिका के बीच समझौते के बाद अफ़गानिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी [माओवादी] ने एक वक्तव्य जारी किया और उसमे साफ़ साफ़ कहा- 'समझौते के बाद तालिबान अमेरिकी साम्राज्यवाद का ही हिस्सा है'


अमेरिका की अफ़गानिस्तान में हार सिर्फ इस अर्थ में हुई है कि वह वहां एक स्थाई दलाल सरकार का गठन करने में कामयाब नहीं हो पाई. लाख प्रयास के बावजूद अमेरिकी कठपुतली सरकारें काबुल से आगे नहीं बढ़ पायी. 2011-12 में ही अमेरिका ने तालिबान को सत्ता में लाने के विकल्प पर सोचना शुरू कर दिया था. और बंद दरवाजे के भीतर बातचीत भी शुरू हो गयी थे. लेकिन तमाम अंदरूनी और बाहरी समीकरणों के कारण यह प्रक्रिया बहुत धीमे-धीमे चली. अंततः फरवरी 2020 में दोहा में तालिबान ने अमेरिका की सारी शर्तें मान ली और सत्ता हस्तांतरण आसान हो गया. यहाँ तक रिपोर्ट है कि इस दौरान कई जगहों पर तालिबान ने अमेरिकी सेना को दूसरे मिलिटेंट ग्रुप के हमलों से बचाया भी है.


बदली विश्व परिस्थिति में [आर्थिक मंदी और चीन का उभार] अमेरिका के लिए अब यह मुश्किल होता जा रहा है कि वह ज़्यादा देशों में अपने सैन्य अड्डे रख सके. इसलिए अब उसे कुछ ख़ास जगहों पर केन्द्रित करना है. इस समय उसकी पहली प्राथमिकता चीन को घेरने की है. और उसकी दूसरी प्राथमिकता मध्य पूर्व में अपनी स्थिति को मजबूत करने की है. इसे देखते हुए अफ़गानिस्तान उसके लिए बोझ साबित हो रहा था. जहाँ वह अब तक 2 ट्रिलियन डालर निवेश कर चुका है. फिर भी कोई स्थाई तंत्र खड़ा नहीं कर सका.


तालिबान की ग्रामीण इलाकों में पकड़ और विगत की कठपुतली सरकारों से अपेक्षाकृत ज़्यादा जन समर्थन से आज अमेरिका को यह लगता है की तालिबान के रूप में उसे अपेक्षाकृत ज़्यादा स्थाई दलाल मिलेगा. ठीक वैसे ही जैसे पिछले 70 सालों से सऊदी अरब अमेरिका का विश्वस्त पिट्ठू बना हुआ है.


आश्चर्य है कि तालिबान की बर्बरता पर अगिया बैताल होने वाला भारतीय मीडिया कभी सऊदी अरब की बर्बरता की बात नहीं करता जो इस वक़्त धरती पर शायद सबसे ज्यादा क्रूर सरकार है. महिलाओं के सन्दर्भ में तो निश्चित ही. 

पत्रकार खगोशी की तुर्की स्थिति दूतावास में जिस तरह से बोटी बोटी काटकर हत्या की गई, उस बर्बरता पर कितने लोगों ने सवाल उठाया. 

शरिया कानून से चलने वाले सऊदी अरब ने जब मोदी को अपना सबसे बड़ा पुरस्कार दिया तो किसी भी मोदी भक्त ने आवाज़ नहीं उठाई. क्या सिर्फ इसलिए कि उसे अमेरिका का समर्थन हासिल है?


आखिर बर्बरता की हमारी परिभाषा क्या है? राउल पेक अपनी प्रसिद्ध फिल्म 'एक्सटर्मिनेट आल द ब्रूटस' [Exterminate All the Brutes] में कहते हैं कि योरोपियन-अमेरिकन लोगों के पास दूसरी सभ्यताओं के मुकाबले सिर्फ एक एडवांटेज था. वह था दूर से हत्या करने का कौशल. कालांतर में दूर से हत्या करने को सभ्य और नज़दीक से हत्या करने को बर्बर मान लिया गया. तालिबान जब किसी को नजदीक से गोली मारता है, या गला रेत कर मारता है तो वह हमें बर्बर लगता है, लेकिन अमेरिका जब ड्रोन से या हवाई हमले से किसी शादी पर हमला करके बच्चों, महिलाओं की हत्या करता है तो वह हमें उतना बर्बर नहीं लगता. 2001 में शुरूआती लड़ाई में अमेरिका समर्थित 'उत्तरी अलायंस' ने अफ़गानी जनता विशेषकर अफ़गानी महिलाओं के साथ किस तरह की जघन्य बर्बरता की थी, उसे हम भूल गये. क्योंकि मीडिया में अब उसका ज़िक्र नहीं है.


न्यूज़क्लिक की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका पूरी पृथ्वी पर प्रति 12 मिनट पर एक बम, 121 बम प्रतिदिन यानी 44,096 बम प्रतिवर्ष बरसाता है. यानि अमेरिका लगातार प्रयास कर रहा है कि दुनिया पाषाण काल की ओर लौट जाए. फिर भी अमेरिका सभ्य देश है? 2001 के बाद से पिछले 20 सालों में अमेरिकी हमलों में करीब 50 हज़ार अफ़ग़ान नागरिक मारे गये. यमन में 2014 के बाद से वहां के गृहयुद्ध में 2 लाख 33 हजार यमनी नागरिक मारे गए हैं. इसकी एकमात्र जिम्मेदारी अमेरिका समर्थित सऊदी अरब सरकार की ही है.


इतिहास के विद्यार्थी यह जानते होंगे कि एक समय था जब अफ़गानिस्तान सहित अधिकांश मुस्लिम देशों में कम्युनिस्ट पार्टियाँ या तो सत्ता में थी या फिर सशक्त विपक्षी पार्टियाँ थी. आज हम जिसे मुस्लिम कट्टरपंथ के रूप में पहचानते हैं, वो सिर्फ सऊदी अरब में कहीं दुबका बैठा था. तारिक अली ने अपनी मशहूर किताब 'बुश इन बेबीलोन' में इसे विस्तार से लिखा है.


समाजवादी रूस और अन्य समाजवादी देशों ने जब से समाजवाद का रास्ता छोड़ा तो मानो अमेरिका और रूस में दुनिया भर के प्रतिक्रियावादियों को कोने अतरों से ढूंढ़ ढूंढकर कर उन्हें खिला पिला कर एक दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करने की होड़़ लग गयी. अफ़गानिस्तान इसी होड़ का अड्डा बन गया.


सच तो यह है कि साम्राज्यवाद और प्रतिक्रियावादी सामंतवाद एक दूसरे के बगैर जीवित ही नहीं रह सकते.  परिणामतः 4 करोड़ की जनसँख्या वाले देश में पिछले 40 सालों में करीब 22 लाख अफ़गान नागरिक मारे गए है.


कहने का मतलब यह है कि तालिबान इस ख़तरनाक खेल का बहुत छोटा खिलाड़ी है.


हमारा अफ़गानों के साथ क्या सम्बन्ध है, इसे 1930 में चन्द्रसिंह गढ़वाली ने शानदार तरीके से लिख दिया था, जब उन्होंने पेशावर में अफ़गान जनता पर गोली चलाने से इनकार कर दिया और इस कारण 11 साल जेल में रहे. लेकिन भारत सरकार ने अफ़गानिस्तान में सोवियत आक्रमण और 2001 में अमेरिकी आक्रमण का निर्लज्ज समर्थन करके हमारी दोस्ती की उस परंपरा से विश्वासघात किया.


मानवता का भविष्य 'काबुलीवाला' और 'चन्द्रसिंह गढ़वाली' में हैं. जो हर देश में मौजूद है और अपनी तरह से लड़ रहे हैं. हमें अपनी उम्मीद इन्हीं पर टिकानी है. यह ज़रूर है कि आज ये संख्या में बहुत कम है और दृश्यमान नहीं हैं. लेकिन रात में सूरज भी तो दृश्यमान नहीं रहता. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सूरज निकलेगा ही नहीं, और दुनिया को अपनी रोशनी से नहालायेगा ही नहीं.

#मनीष आज़ाद

Monday, August 9, 2021

ओलम्पिक खेलों का असली 'खेल'




'यदि आप अपने शहर के गरीबों से मुक्ति पाना चाहते हैं, तो ओलंपिक आयोजित कीजिये'. 

इस विचारोत्तेजक लेख में लेखक 'अशोक कुमार' ने एक रिपोर्ट [COHRE] के हवाले से बताया है कि सिओल ओलंपिक [1988] से बीजिंग ओलंपिक [2008] तक सिर्फ 20 साल के अंदर ओलंपिक आयोजन के कारण 35 लाख लोगों को जबरन विस्थापित किया गया है. 2010 में अपने देश में हुए 'कॉमनवेल्थ खेल' के कारण दिल्ली में कुल 2 लाख 50 हजार लोग विस्थापित हुए थे. जाहिर है, इनमे से ज़्यादातर गरीब-दलित ही थे. वर्तमान टोक्यो ओलंपिक में एक परिवार तो ऐसा है जिसे ओलंपिक के कारण 2 बार विस्थापित होना पड़ा है. पहले 1964 टोक्यो ओलंपिक में और अब वर्तमान टोक्यो ओलंपिक में.

जो लोग 2010 में दिल्ली में होंगे वे याद कर सकते हैं कि अक्टूबर में दिल्ली किसी फौजी छावनी में बदल दी गयी थी. सभी तरह के विरोध-प्रदर्शनों को प्रतिबंधित कर दिया गया था. सौन्दर्यीकरण के नाम पर आसपास की सभी झुग्गी बस्तियों को मिटा दिया गया था. बस्तियों में रहने वालों को दिल्ली से बाहर खदेड़ दिया गया था. इससे पहले एशियाड [1982] में भी यही सब कुछ घटित हुआ था. उस समय मानव अधिकारों के व्यापक उल्लंघन और 'एशियाड साईट' पर मजदूरों के निर्मम शोषण पर 'पीयूडीआर' ने एक शानदार रिपोर्ट 'सफ़ेद अप्पू' निकाली थी. यह रिपोर्ट उनकी वेबसाईट पर अभी भी मौजूद है.

यह सब प्रत्येक ओलंपिक में कहीं ज्यादा विशाल पैमाने पर घटित होता है.

टोक्यो में भी कोरोना महामारी के बीच यही सब घटित हुआ. इसीलिए वहां की 83 प्रतिशत जनता ओलम्पिक का विरोध कर रही थी. एक जापानी महिला चीख कर कह रही थी कि लाक डाउन में हमारे बच्चे तो खेल नहीं पा रहे और सरकार ओलंपिक आयोजित कर रही है.

लेकिन अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूँजी के साथ मिलकर जापान के शासक इसे फौजी बूटों तले संपन्न कर चुके हैं.

जापान को 2013 में जब वर्तमान ओलंपिक का अधिकार मिला तो उस वक़्त वह फुकोशिमा न्युक्लिएर रिएक्टर विस्फोट/भूकंप/सुनामी के प्रभावों से जूझ रहा था, जिसमे करीब 20 हजार लोग मारे गए थे और लाखों विस्थापित हुए थे. 

2013 के बाद जापान ने अपने अधिकाँश संसाधन, यहाँ तक कि क्रेनो को भी फुकोशिमा न्युक्लिएर रिएक्टर विस्फोट/भूकंप/सुनामी से प्रभावित लोगों के लिए इस्तेमाल करने की बजाय उसे ओलंपिक की तैयारी पर लगा दिया. फुकोशिमा न्युक्लिएर रिएक्टर के विकिरण से अभी भी लोग धीमी मौत मर रहे हैं.

तभी से जापान की जनता ओलंपिक का विरोध कर रही थी और उसे कैंसिल करने की मांग कर रही थी.

ओलंपिक के राजनीतिक-अर्थशास्त्र पर अनेकों किताब लिखने वाले 'जुएल बायकाफ' [Jules Boykoff ] कहते हैं कि ओलंपिक के कुम्भ में अनेकों बदनाम बहुराष्ट्रीय कम्पनियां प्रायोजक बनकर अपने पाप धोती हैं. 'डो केमिकल' [भोपाल गैस काण्ड की दोषी], 'कोका कोला' [जमीन से पानी का अंधाधुंध दोहन करने वाली और अनेक देशों में मानव अधिकारों के गंभीर उल्लंघन की दोषी] और 'बीपी' [पर्यावरण को गंभीर नुक्सान पहुचाने वाली कंपनी] जैसी कम्पनियाँ इन ओलंपिक के प्रायोजक होते हैं. पिछले माह 23 जुलाई को अदानी [अदानी-अम्बानी वर्तमान किसान आन्दोलन के निशाने पर हैं] ने भी ओलंपिक के भारतीय चैप्टर की स्पांसरशिप स्वीकार कर ली थी.

इसीलिए जुएल बायकाफ अपनी किताब 'Celebration Capitalism and the Olympic Games' में साफ़ साफ़ कहते हैं कि ओलंपिक का उत्सव वास्तव में पूंजीवाद का उत्सव है.

एक अन्य जगह जुएल बायकाफ लिखते हैं कि ओलंपिक में 'पब्लिक स्पेस' का जिस तरह सैन्यीकरण किया जाता है, ओलंपिक संपन्न कराने के लिए जिस दमन तंत्र का सहारा लिया जाता है, वह ओलंपिक ख़त्म होने के बाद भी बरकरार रहता है. 

1984 के लास एंजेल्स ओलंपिक की सुरक्षा के नाम पर वहां की पुलिस को अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया गया. ओलंपिक ख़त्म होने के बाद इन हथियारों को बड़े पैमाने पर तथाकथित 'ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई' में वहां के कालों के खिलाफ इस्तेमाल किया गया. भारत में भी एशियाड और कामनवेल्थ खेलों में जिन्हें उजाड़ा गया था, उन्हें फिर कभी वापस नहीं बुलाया गया. लन्दन ओलंपिक [2012] में तो एक सुबह अपार्टमेंट के लोगों ने पाया कि बिना उनसे पूछे उनकी छतों पर सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल तैनात कर दी गयी है और अपार्टमेंट के लोगों को उनके अपने छत पर जाना प्रतिबंधित कर दिया गया है.

इस सैन्यीकरण का चरम तो मेक्सिको ओलंपिक [1968] के दौरान घटा. जहाँ मुख्य स्टेडियम के बाहर हजारों लोग जमा होकर नारा लगा रहे थे- 'हमें ओलंपिक नहीं क्रांति चाहिए'. पुलिस ने इन प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग कर दी और 325 प्रदर्शनकारी मारे गए.

ऐतिहासिक पेरिस कम्यून [1871] और फ़्रांस-प्रशा युद्ध के 25 साल बाद आधुनिक ओलंपिक की शुरुआत हुई थी. इसका जनक फ़्रांस के कुबिर्तान [Baron Pierre de Coubertin] थे,जो भयानक नस्लवादी और स्त्री-विरोधी [misogynist] व्यक्ति था.

कुबिर्तान ने अपने एक लेख ['France Since 1814'] में ओलम्पिक खेल के उद्देश्य को साफ़ साफ़ रखा-'खेल को युद्ध की अप्रत्यक्ष तैयारी के रूप में देखा जा सकता है. युद्ध की सेवा करने वाली सभी योग्यताएं यहाँ परवान चढ़ती हैं.' आगे कुबिर्तान और भी महत्वपूर्ण बात कहते है- 'खेल वर्ग संघर्ष को शांत करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, ताकि दुबारा पेरिस कम्यून जैसी घटना न घटित हो'.

यानी ओलंपिक कमेटी [IOC] का यह दावा कि वह एक ग़ैर राजनीतिक संस्था है, एकदम झूठ है.

ओलंपिक में पदक लाने या जीत हासिल करने पर कैसे पूरे देश की भावना को एक किये जाने का प्रयास मीडिया करता है, वह आज हम देख रहे है. ओलंपिक में महिला एथलीटों की सफलता पर मोदी की तारीफ़ और प्रगतिशील लोगों की तारीफ़ को एक दूसरे से अलगाना मुश्किल है.

वंदना कटारिया को हमने 'दलित आइकन' के रूप में उछाला और 48 घंटे के अंदर वो दलित आइकन से 'भाजपा आइकन' में तब्दील हो गयी. उन्हें 'बेटी बचाओ बेटी पढाओ' का उत्तराखंड का ब्रांड अम्बेसडर बना दिया गया. 15 अगस्त को वे मोदी के साथ लाल किले पर भी मौजूद रहेंगी. क्या इन सब में हमें कुबिर्तान के उपरोक्त कथन की सच्चाई नहीं दिखती ?

ओलंपिक के प्रायः सभी सफल चेहरे कुछ समय बाद जनता की आकांक्षाओं का गला घोंटते हुए किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का उत्पाद बेचते नज़र आते हैं।

हालांकि कई बार ऐसे मौके आये हैं, जब ओलंपिक खिलाडियों ने ओलंपिक और अपने राज्य का पुर्जा बनने से इनकार कर दिया है. बल्कि इससे उलट ओलंपिक प्लेटफार्म का इस्तेमाल दुनिया की शोषित जनता की आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति देने में किया. 1968 में मेक्सिको ओलम्पिक में अमेरिका के ब्लैक एथलीट टोमी स्मिथ [Tommie Smith] और जॉन कार्लोस [John Carlos] ने जब मेडल पोडियम पर 'ब्लैक सेलूट' किया तो पूरी दुनिया के शोषितों में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी. हालांकि इसके फलस्वरूप उनके मेडल छीन लिए गए, लेकिन वे शोषित जनता की निगाह में 'लीजेंड' बन गए. फिलहाल भारत के खिलाडियों में ऐसा कुछ करने की दूर दूर तक कोई संभावना नज़र नहीं आती.

ओलम्पिक को प्रत्येक देश विश्व में अपनी ताकत दिखाने के साधन [जुएल बायकाफ के शब्दों में 'सॉफ्ट पावर'] के रूप में इस्तेमाल करता है और इस प्लेटफार्म को अपने उग्र राष्ट्रवाद/फासीवाद के प्रचार के लिए इस्तेमाल करता है. 1936 के बर्लिन ओलम्पिक को कैसे हिटलर ने अपने फासीवाद के प्रचार के लिए इस्तेमाल किया इसे हम सब जानते हैं.

ओलम्पिक खेल जिस पब्लिक-प्राइवेट माडल पर आयोजित किये हैं, उससे निजी कम्पनियाँ और ओलंपिक कमेटी [IOC] खूब मुनाफा कूटती है और सरकारों पर कर्ज का भारी बोझ चढ़ जाता है. एशियाड और कामनवेल्थ खेलों के बाद अपने देश में भी यही हुआ था. 1976 में आयोजित मोनट्रीयल ओलंपिक [Montreal Olympics] ने मोनट्रीयल पर 1.6 बिलियन डालर का कर्ज चढ़ा दिया, जो 40 साल बाद 2006 में जाकर उतर पाया. इस कर्ज को उतारने के चक्कर में सरकार ने शिक्षा-स्वास्थ्य में असाधारण कटौती की. इसके कारण कितने लोग प्रभावित हुए, कितने लोग बेरोजगार हुए, कितने लोग स्वास्थ्य सुविधा न मिलने से मर गये, इसकी एक अलग कहानी है. लगभग यही कहानी हर ओलंपिक के बाद दोहराई जाती है.

2008 बीजिंग ओलम्पिक में ओलंपिक कमेटी [IOC] ने कुल 383 मिलियन डालर की कमाई की. जबकि दूसरी ओर इस ओलंपिक के कारण कुल 15 लाख लोगों को बेघर होना पड़ा. इस विस्थापन के खिलाफ प्रदर्शन करने पर हजारों लोगों को जेल जाना पड़ा.

सच तो यह है कि ओलंपिक का आयोजन 'विश्व उपभोक्ता बाजार' को 4 साल में एक बार एक मंच पर ले आता है, जिसका फायदा बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ उठाती हैं. ओलंपिक कमेटी [IOC] के भूतपूर्व मार्केटिंग डायरेक्टर मिशेल पाने [Michael Payne] इसे साफ़ शब्दों में कहते हैं- 'कंपनियों के लिए ओलंपिक से अच्छा प्लेटफार्म और कहाँ मिल सकता है, जहाँ वे अपने विश्व उपभोक्तायों को इतने ताकतवर तरीके से आपस में जोड़ सकें और अपने उत्पाद का प्रचार उन तक पहुचा सकें'.

उपरोक्त कारणों से ही पिछले कुछ दशकों से ओलंपिक को ख़त्म करके इसे विकेंद्रित करने की मांग की जा रही है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चंगुल में ओलंपिक का खेलों पर एकाधिकार खेल की आत्मा को मार रहा है. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि पहले ओलंपिक नाम से कई आयोजन होते थे. लेकिन 1896 के बाद ओलंपिक कमेटी ने 'ओलंपिक' शब्द पर कापीराइट ले लिया. अब आप ओलंपिक नाम से कोई आयोजन नहीं कर सकते.

1917 की रूसी क्रांति के बाद समाजवादी रूस ने ओलंपिक खेलों का बहिष्कार कियाऔर ओलंपिक पर यह कहते हुए हमला किया कि यह अंतरराष्ट्रीय बुर्जुआ के हाथों की कठपुतली है और अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा को वर्ग संघर्ष से हटाकर प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद और युद्ध के लिए तैयार करता है. 1921 के तीसरे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल में 'रेड स्पोर्ट इंटरनेशनल' [RSI] की स्थापना की गयी. उधर सामाजिक-जनवादियों ने भी ओलंपिक के विरुद्ध 'सोशलिस्ट वर्कर स्पोर्ट इंटरनेशनल' [SWSI ] का गठन कर लिया.

हिटलर के बर्लिन ओलम्पिक [1936] के ख़िलाफ़ जब स्पेन के बार्सिलोना में कम्युनिस्टों-समाजवादियों ने 'जन ओलंपिक' [People’s Olympics] का आयोजन किया तो ठीक उसी समय तानाशाह फ्रांको ने नव-स्थापित रिपब्लिक के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया. 'जन ओलम्पिक' के लिए पूरे योरोप से जो भी एथलीट बार्सिलोना में इकठ्ठा हुए थे, उनमे से अधिकांश ने रिपब्लिक की रक्षा में बन्दूक उठा ली और फ्रांको के खिलाफ इंटरनेशनल ब्रिगेड का हिस्सा हो गए.

खेल और क्रांतिकारी राजनीति का यह शानदार और अनूठा मेल था.

[द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की बदली राजनीतिक परिस्थिति में पहली बार 1952 में हेलसिंकी ओलंपिक में सोवियत रूस ने हिस्सा लिया.]

इस असली 'खेल' को समझने के बाद क्या हम ओलंपिक में खेल को 'शुद्ध खेल' के रूप में देख सकते हैं?

गीत-संगीत-नृत्य सभी को पसंद होता है. लेकिन क्या इसका कोई मतलब नहीं कि वह कहाँ घटित हो रहा है? मतलब वह गाँव की चौपाल में घटित हो रहा है या सामंत के दरबार में?

खेल बहुत जरूरी है. लेकिन यह जानना उससे कहीं अधिक जरूरी है कि वह क्यों और कहाँ खेला जा रहा है और खेल के पीछे का 'खेल' क्या है.


#मनीष आज़ाद